Book Title: Gujaratioe Hindi Sahityama Aapel Falo
Author(s): Dahyabhai Pitambardas Derasari
Publisher: Gujarat Varnacular Society Ahmedabad

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Page 25
________________ १८ (२) विकसित कंजन की रुचि को हैरत हठि, करत उदोत छिन-छिन ही नवीनो है। लोचन चकोरन को सुख उपजावे अति, धरत पियूख लखे मेटि दुःख दीनो है। छबि दरसाय सरसाय मीन केतन को, तापै बुधि हीन बिधि काहे बिधु कीनो है। एहो नंदनंद प्यारी तेरो मुख चंद यह, चंद ते अधिक अंक पंक के बिहीनों है ॥२॥ (या ७ मन्ने प्रविये। त छ). (३) अरुन हरौल नभ-मंडल मुलुक पर चढो अक्क, चक्कएँ कि तारि दै किरनि कोर । आवत ही सावत नछत्र जोय धाय धाय, घोर घमसान करि काम आये ठोर ठोर। ससिहर सेत भयो सटक्यो सहमि ससी-आमिल, उलूक जाय गिरे कन्दरन ओर । दुन्द देखि अरबिंद बंदीखाने ते भगाने पायक, पुलिंद वै मलिन्द मकरंद चोर ॥३॥ રઘુરામ નામને વિસનગરો નાગર કવિ અમદાવાદમાં થઈ ગયા છે. એણે સંવત ૧૭૫૭ ના ચૈત્ર रघुराम १७५७ सुदभागने शुक्वारे “ समासार" नामनी अंथ मनाथ्य . આ કવિ પોતાની હકીક્ત આપે છે કે – Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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