Book Title: Bauddh Dharm Evam Darshan
Author(s): Sagarmal Jain
Publisher: Prachya Vidyapith

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Page 17
________________ महत्त्वपूर्ण ग्रंथ कहा जा सकता है, किंतु उसका मुख्य उद्देश्य भी प्रत्येक दर्शन की अपूर्णता को सूचित करते हुए अनेकान्तवाद की स्थापना करना रहा है। पं. दलसुखभाई मालवणिया शब्दों में नयचक्र की कल्पना के पीछे आचार्य का आशय यह है कि कोई भी मत अपने आप में पूर्ण नहीं है। जिस प्रकार उस मत की स्थापना दलीलों से हो सकती है, उसी प्रकार उसका खण्डन भी। स्थापना और उत्थापन का यह चक्र चलता रहता है। अतएव अनेकान्तवाद में ये मत यदि अपना उचित स्थान प्राप्त करते हैं, तभी उचित है, अन्यथा नहीं।' नयचक्र की मूलदृष्टि भी स्व-पक्ष अर्थात् अनेकान्तवाद के मण्डन और पर - पक्ष के खण्डन की ही है। इस प्रकार जैन परम्परा में भी हरिभद्र के पूर्व तक निष्पक्ष भाव से कोई भी दर्शन - संग्राहक ग्रंथ नहीं लिखा गया । जैसा कि हमने पूर्व में संकेत किया है जैनेतर परम्पराओं के दर्शन - संग्राहक ग्रंथों में आचार्य शंकर विरचित माने जाने वाले 'सर्वसिद्धान्तसंग्रह' का उल्लेख किया जा सकता है। यद्यपि यह कृति माधवाचार्य के 'सर्वदर्शनसंग्रह' की अपेक्षा प्राचीन है, फिर भी इसके आद्य शंकराचार्य द्वारा विरचित होने में संदेह है। इस ग्रंथ में भी पूर्वदर्शन का उत्तरदर्शन के द्वारा निराकरण करते हुए अंत में अद्वैत वेदान्त की स्थापना की गई है। अतः किसी सीमा तक इसकी शैली को नयचक्र की शैली के साथ जोड़ा जा सकता है, किंतु जहां नयचक्र, अंतिम मत का भी प्रथम मत से खण्डन करवाकर किसी भी एक दर्शन को अंतिम नहीं मानता है, वहां 'सर्वसिद्धांतसंग्रह' वेदांत को एकमात्र और अंतिम सत्य स्वीकार करता है। अतः यह एक दर्शन-संग्राहक ग्रंथ होकर भी निष्पक्ष दृष्टि का प्रतिपादक नहीं माना जा सकता है। हरिभद्र के षड्दर्शन समुच्चय की जो विशेषता है, वह इसमें नहीं है। जैनेतर परम्पराओं में दर्शन- संग्राहक ग्रंथों में दूसरा स्थान माधवाचार्य ( ई. 1350) के 'सर्वदर्शनसंग्रह' का आता है। किंतु 'सर्वदर्शनसंग्रह' की मूलभूत दृष्टि भी यही है कि वेदांत ही एकमात्र सम्यग्दर्शन है । 'सर्वसिद्धान्तसंग्रह' और 'सर्वदर्शनसंग्रह ' दोनों की हरिभद्र के षड्दर्शनसमुच्चय से इस अर्थ में भिन्नता है कि जहां हरिभद्र बिना किसी खण्डन- मण्डन के तटस्थ भाव से तत्कालीन विविध दर्शनों को प्रस्तुत करते हैं, वहां वैदिक परम्परा के इन दोनों ग्रंथों की मूलभूत शैली खण्डनपरक ही है। अतः इन दोनों ग्रंथों में अन्य दार्शनिक मतों के प्रस्तुतिकरण में वह निष्पक्षता और उदारता परिलक्षित नहीं होती, जो हरिभद्र के षड्दर्शनसमुच्चय में है। 11

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