Book Title: Apbhramsa Abhyasa Saurabh
Author(s): Kamalchand Sogani
Publisher: Apbhramsa Sahitya Academy

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Page 260
________________ अर्थ-देवांगनामों को सतानेवाले रावण ने क्रोध से भरकर पहली ही भिड़न्त में विभीषण को ललकारा। 7. के वि सामि-भत्ति-वन्त मच्छरग्गि-पज्जलन्त । के वि पाहवे अभङ्ग कङ कुम-प्पसाहियङ्ग ।। -पउमचरिउ 59.2.5-6 अर्थ-स्वामी की भक्ति से परिपूर्ण वे ईर्ष्या की आग में जल रहे थे। अनेक युद्धों में अजेय कितनों के शरीर केशर से प्रसाधित थे । 8. 9. सोम-सुहं परिपुण्ण-पवित्तं जस्स चिरं चरियं सु पवित्तं । सिद्धि-वहू मुह-दसण-पत्तं सील-गुणव्व य-सञ्जम-पत्तं ।। -पउमचरिउ 71.11.3-4 अर्थ-सोम की भांति हे कल्याणमय, हे परिपूर्ण, पवित्र, आपका चरित्र सदा से पवित्र है, तुमने सिद्ध-वधु का घूघट खोल लिया है, शील सयम और गुणवतों की तुमने अन्तिम सीमा पा ली है । पणट्ठदेसु सुक्कलेसु सजमोहवित्तो । तिलोयबंधु णाणसिंधु मव्वजमित्तो ।। अलंघसत्ति बंभगुत्ति सुप्पयत्त रक्खणो । जिणिद उत्त-सत्ततत्त-प्रोहिणाण-अक्खणो ।। -सुदंसणचरिउ 10.3.10-13 अर्थ-उनका द्वेष नष्ट हो गया था, शुक्ल लेश्या प्रकट हो गई थी और वे संयमों के समूहरूप धन के धारी थे (अर्थात् बड़े तपोधन थे), वे त्रैलोक्य बन्धु थे, ज्ञान-सिन्धु व भव्यरूपी कमलों के मित्र (सूर्यसमान हितैषी) थे। वे अलंघ्य शक्ति के धारी थे, ब्रह्मयोगी थे, प्रयत्नपूर्वक जीवों की रक्षा करनेवाले थे एवं जिनेन्द्र द्वारा कहे गये सात तत्त्वों का अवधिज्ञान-पूर्वक भाषण करनेवाले थे । 10. ससि विव कलोहेण जलहि व जलोहेण हयकूरकम्मेण तं वड्ढधम्मेण । -जसहरचरिउ 1.17.7-8 अपभ्रंश अभ्यास सौरभ ] 247 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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