Book Title: Anusandhan 2007 12 SrNo 42
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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डिसेम्बर २००७ संसारसमुद्रथी तारिवाने जिहाज, एकांतशरण योग्य अरहंत शरण हो ।
तहा पहीणजरमरणा अवेअकम्मकलंका पणट्ठवाबाहा केवलनाणदंसणा सिद्धिपुरनिवासी निरुवमसुहसंगया सव्वहा कय किज्जा( च्चा)सिद्धा सरणं ।
तिम प्रक्षीण छै जरामरण जेहोनई, गयो ? कर्मकलंक जेहोनें, प्रगट (प्रणष्ट) छै व्याबाधा जेहोनइं, केवलज्ञान केवलदर्शन , जेहोनइं, मोक्षपुरना वासी, निरुपम सुखनइं पाम्या छै, सर्वथा कृतकृत्य थया, एहवा सिद्ध शरण हो।
तहा पसंतगंभीरासया सावज्जजोगविरया पंचविहायारजाणगा परोवयारनिरया पउमाइनिर्दसणा झाणझ( ज्झ )यणसंगया विसुज्झमाण भावा साहू सरणं ।
तथा प्रशांत गंभीर छै आशय जेहोनो एहवा, सावद्य योगथी जे विरम्या एहवा, ज्ञानाचारादि पंचविधाआचारनां जांणणहार एहवा, परोपकार करवामां उद्यमी एहवा, संसारमा वसतां पद्मादिकनुं दृष्टांत छै जेहोने एहवा, ध्यांने अध्ययनैं संयुक्त एहवा, विशुध्यमान परिणाम जेहोनौ एहवा साधु शरणं ।
तहा सुरासुरमणुअपूइओ मोहतिमिरंसुमाली रागदोसविसपरममंतो हेऊ सव्वकल्लाणाणं कम्मवणविहावसू साहगो सिद्धभावस्स केवलीपन(न)त्तो धम्मो जावज्जीवं मे भगवं सरणं ।।
तिम सुरई असुरई मनुष्यइं पूज्यौ,मोहरूप अंधकार फेडवा सूर्य, रागद्वेषरूप विषने वारवा परममंत्र, कारण समस्त कल्याणोनुं, कर्मरूप वननें विषे अग्नि, साधक सिद्धभावनो एहवो, केवलीनो प्ररूप्यो धर्म जहां जीव तिहां सूधी मुझने भगवंत शरण हो ।
सरणमुवगओ अ एएसिं गरिहामि दुक्कडं । शरणे पाम्यो हुं एहोनइं, गरहु छु दुकृत प्रतें ।
जण्णं अरहंतेसु वा सिद्धेसु वा आयरिएसु वा उझ्झाएसु वा साहूसु वा साहुणीसु वा अन्नेसु वा धम्मट्ठाणेसु माणणिज्जेसु पूअणिज्जेसु ।
जे अरहंतनें विर्षे, सिद्धोनें विर्षे, आचार्योनई विर्षे, उपाध्यायोने विर्षे, साधुओनें विषे, साध्वीओनें विषं, बीजाय वा धर्मना ठेकाणाओगे विर्षे, मानवा
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