Book Title: Adhyatmik Hariyali
Author(s): Buddhisagar
Publisher: Narpatsinh Lodha
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( 11 )
हरियाली (३)
सहजानंदि शीतल सुख केशर चंनद घोली पूजे
भोगीतो, हरि दुःख हरिशता वरी । कुसुमें, अमृत वेलीन । वैरीनी बेटी तो ॥ कंत हार तेहजो अरि ॥ १ ॥ केशर. ॥ तेहना स्वामी नी कांतानं नाम तो, एक वर्णे लक्षय भरी । केशर. । ते धुर थायीने आगल हविये तो, उष्माल चंद्रक बंधरी ॥ २ ॥ केशर. ।। स्पर्शनो वर्ण ते नयन प्रमाणे तो, मात्रा सुंदर सिरधरी । केशर. । विसराज सूत्र दाहड जाये तो, तिग वर्णादि दूरे करी ||३|| केशर. ॥ एक वीशमें स्पर्शे धरी करण तो, अर्थाभिध ते समहरी । केशर. । संतस्थे जीभे स्वर टाली तो, शिवगामी गति सायरी ॥४॥ | केशर. । वीस स्पर्श वली संयम माने तो, आदि करण धरी दिल धरी । केशर. इणे नाम जिनवर नित्य ध्याउं तो, जिनहर जिकुं धरोहरो ॥५॥ केशर. ॥ siaके हत्थो वृषजन बोले तो, वात ए दिल मां न उतरे। केशर. ॥ अज ईश्वर पण सीतानी आगे तो, जस विवस जडता धरी ॥ ६॥ | केशर ॥ तेजिन तस्कर तु जिन रामतो, हरि प्रणमें तुझ पाउं परो । केशर । बाल पणे उपगारे हरिपति, सेवन छल लंछन हरि ||७|| केशर ॥ सारंग मां चंपाज्यं गरफत, ध्यान अनुभन लहरी ॥ केशर ॥ श्री शुभवीर विजय शिव बहु ने तो, घर तोडतां होय धरी ॥ ८ | केशर ॥
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