Book Title: Uttaradhyayan Sutram Part 03
Author(s): Atmaramji Maharaj, Shiv Muni
Publisher: Jain Shastramala Karyalay

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Page 440
________________ छ: महीनों का प्रतिपादन किया गया है, अर्थात् चतुरिंद्रिय जीव अधिक से अधिक छ: मास तक ही जीवित रह सकता है। अब इनकी काय-स्थिति के विषय में कहते हैं संखिज्जकालमुक्कोसं, अंतोमुहुत्तं जहन्नयं । चउरिदियकायठिई, तं कायं तु अमुंचओ ॥ १५२ ॥ सङ्ख्येयकालमुत्कृष्टा, अन्तर्मुहूर्त जघन्यका । चतुरिन्द्रियकायस्थितिः, तं कायन्त्वमुञ्चताम् ॥ १५२ ॥ पदार्थान्वयः-चउरिंदिय-चार इन्द्रियों वाले जीवों की, कायठिई-कायस्थिति, तं कायं-उस काया को, तु-फिर, अमुंचओ-न छोड़ते हुओं की, जहन्नयं-जघन्य, अंतोमुहुत्तं-अंतर्मुहूर्त, उक्कोसं-उत्कृष्ट, संखिज्जकालं-संख्येयकाल की कथन की गई है। मूलार्थ-चतुरिंद्रिय जीवों की उस काया को न छोड़ें तब तक की जघन्य कायस्थिति अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट संख्यातकाल की होती है। टीका-अपनी काया को छोड़कर अन्यत्र न जाना अर्थात् उसी में जन्म-मरण करते रहना कायस्थिति है। चतुरिन्द्रिय जीव कम से कम तो अन्तर्मुहूर्त मात्र और अधिक से अधिक संख्येयकाल तक अपनी काया में जन्मता-मरता रहता है, अर्थात् अधिक से अधिक इतने काल के अनन्तर वह अन्यत्र अवश्य चला जाता है। . . . अब इनका अन्तर-काल बताते हैं. अणंतकालमुक्कोस, अंतोमुहत्तं जहन्नयं । विजढम्मि सए काए, अंतरं च वियाहियं ॥ १५३ ॥ अनन्तकालमुत्कृष्टम्, अन्तर्मुहूर्त जघन्यकम् । वित्यक्ते स्वके काये, अन्तरञ्च व्याख्यातम् ॥ १५३ ॥ पदार्थान्वयः-सए-स्व, काए-काय के, विजढम्मि-छोड़ने पर, जहन्नयं-जघन्य, अंतोमुहुत्तं-अन्तर्मुहूर्त, उक्कोसं-उत्कृष्ट, अणंतकालं-अनन्तकाल का, अंतरं-अन्तरकाल अर्थात् अन्तराल, वियाहियं-कहा है। मूलार्थ-छोड़ी हुई स्वकाय को फिर से प्राप्त करने में चतुरिन्द्रिय जीव का जघन्य अन्तराल अन्तर्मुहूर्त का और उत्कृष्ट अनन्तकाल तक का प्रतिपादन किया गया है। टीका-अपने पूर्व शरीर को छोड़कर अन्यत्र गया हुआ चतुरिन्द्रिय जीव, कम से कम और अधिक से अधिक कितने समय के बाद फिर उस चतुरिंद्रिय शरीर में वापिस आता है ? इस प्रश्न का प्रस्तुत गाथा में उत्तर दिया गया है। तात्पर्य यह है कि कम से कम तो वह अन्तर्मुहूर्त के ही अनन्तर वापिस लौट आता है और अधिक से अधिक अनन्तकाल का समय लग जाता है। अब प्रकारान्तर से इनके असंख्य भेदों का निरूपण करते हैं, यथा एएसिं वण्णओ चेव, गंधओ रसफासओ । संठाणादेसओ वावि, विहाणाइं सहस्ससो ॥ १५४ ॥ उत्तराध्ययन सूत्रम् - तृतीय भाग [४३१] जीवाजीवविभत्ती णाम छत्तीसइमं अज्झयणं

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