Book Title: Upasakdashanga Sutra
Author(s): Abhaydevsuri, 
Publisher: Abhaydevsuri

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Page 139
________________ उपासकदशांग सानुवाद ७ सद्दालपुत्र अध्ययन ॥१३९॥ ॥१३९॥ परिवेजा वा, अग्गिमित्ताए वा भारियाए सद्धिं विउलाई भोग भोगाई भुञ्जमाणे विहरेजा, तस्स णं तुम पुरिसस्स किं दण्डं निवत्तेजासि? भन्ते ! अहं णं तं पुरिसं आओसेजा वा हणेज्जा वा बन्धेजा वा महेजा वा तज्जेजा वा तालेला वा निच्छोडेजा वा निभच्छेला वा अकाले चेव जीवियाओ ववरोवेजा। सद्दालपुत्ता! नो खलु तुब्भं केइ पुरिसे वायाहयं वा पक्केल्लयं वा कोलाल भण्डं अवहरइ वा जाव परिहवेइ वा, अग्गिमित्ताए वा भारियाए सद्धिं विउलाई भोगभोगाई भुञ्जमाणे विहरइ, नो वा तुम तं पुरिसं आओसेन्जसि वा हणिजसि वा जाव अकाले चेव जीवियाओ ववरोवेजसि, जइ नत्थि उट्ठाणे इ वा जाव परक्कमे इ वा नियया सव्वभावा। अहणं तुम्भं केइ पुरिसे वायाहयं जाव परिहवेइ वा, अग्गिमित्ताए वा जाव विहरइ, तुम वा तं पुरिसं आओवायुथी सूकायेला (काचा) अने पाकेला कुंभारना पात्रने हरी जाय, ज्यां त्यां फेंकी दे, फोडी नाखे, बलात्कारे ले, बहार मूकी दे, अथवा तारी स्त्री अग्निमित्रा साथे विपुल भोगो भोगवतो विहरे तो शुं तुं ते पुरुषने शिक्षा करे ? हे भगवन् ! हुं ते पुरुषने आक्रोश करूं, हणुं, बांधु, मारूं, तजना करूं, ताडन करूं, तेनुं बधुं खुंचवी लडं अने तेनो तिरस्कार करु, तथा तेने अकालेज जीवितथी मुक्त करूं. सद्दालपुत्र! जो उत्थान नथी, यावत् पुरुषकार-पराक्रम नथी अने सर्व भावो नियत छे तो कोई पुरुष तारा वायुथी सूकायेला (काचा) अने पाका कुंभारना पात्रने हरण करतुं नथी, यावत् बहार लइने मूकतुं नथी, अने तारी अग्निमित्रा भार्या साथे विपुल भोगो भोगवतुं नथी, तथा तुं ते पुरुपने आक्रोश करतो नथी, हणतो नथी यावत् अकाले जीवितथी मुक्त करतो नथी, अने जो तारा वायुथी स्कायेला पात्रने कोई पुरुष हरी जाय यावत् बहार मूकी दे, तथा अग्निमित्रानी साथे कोइ पुरुष विपुल भोगो भोगवतो विहरे अने तु ते पुरुषने आक्रोश करे

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