Book Title: Upasakdashanga Sutra
Author(s): Abhaydevsuri,
Publisher: Abhaydevsuri
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उपासकदशांग सानुवाद
तहिं निप्पट्टपसिणवागरणं करेइ, से तेणटेणं सद्दालपुत्ता! एवं वुच्चइ-'नो खलु पभू अहं तव धम्णायरिएणं| जाव महावीरेणं सद्धिं विवादं करेत्तए । ज्या ज्यां पकडे त्यां त्यां निरुत्तर करे छे, ते हेतुथी हे सद्दालपुत्र ! हुं एम कहुं छु के 'हुं तारा धर्माचार्य यावत् भगवान् महावीरनी साथे विवाद करवाने समर्थ नथी.
सद्दालपुत्र अध्ययन
॥१५४॥
॥१५४॥
जेना छे पवो, 'चम्मेदृगहणमोट्टियसमाहयनिचियगायकाए' चर्मेटका-इंटना ककडा वगेरेथी भरेली चामडानी कुल्लो, जेने खेंचवा वडे धनुषधारी व्यायाम करे छे, दुघण-मुद्गर, मौष्टिक जेमां चामडानी दोरी परोवेली छे एवो-मुठी प्रमाण पत्थरनो गोळो, ते बडे समाहत-व्यायाम करवामां ठोकेला गात्र-अंगो जेना छे एवा शरीरवाळो, आ विशेषण वडे अभ्यास जन्य सामर्थ्य बतायुं. 'लंघणपवणजविणवायामसमत्थे लंघन-उल्लंघन करवू, प्लवन-कुदबुं अने जविनव्यायाम-ते सिवाय अन्य शीघ्र व्यायाम, तेओमां समर्थ, 'उरस्सबलसमागप' औरस्य-अंतरना उत्साह अने बल सहित, 'छए' प्रयोगने जाणनार, 'दक्खे' दक्षः-शीघ्र करनार, 'पत्तट्टे' प्रस्तुत काममा पूर्णताने प्राप्त थयेल, 'प्रज्ञ' पम अन्य आचार्य अर्थ करे छे. 'कुसले' विचारपूर्वक करनार, 'मेहावि' त्ति. एकवार जोयेल अने सांभळेल कर्मने जाणनार, 'निउणे' उपायनो आरंभ करनार, 'निउणसिप्पोवगए' सूक्ष्म शिल्प युक्त (मनुष्य) 'अजे वा' बकरो, 'एलकं वा' घेटो, 'शूकरं वा' दुक्कर, कुर्कुट-कुकडो, तित्तिर-तेतर, वर्तक-बतक, लावक-लावा, कपोत-पारेवा कपिंजल, वायस-कागडो, श्येन-बाज ए बधा लोक प्रसिद्ध पक्षीओ जाणवा. तेने 'हत्थंसि वा' हाथने विशे, जो के अज वगेरेने हाथ होता नथी, तो पण आगळनो पग हाथ जेवो छ पम समजी 'हाथने विशे' पम कयुं छे, जेने जे संभवे ते प्रमाणे हाथ, पग, खरी, पुच्छ, पिच्छ, शिंगडा, विषाण अने रोमनी योजना करवी. पिच्छ-पिछा-पांखनो अवयवविशेष, शिंगडा बकरा अने घेटाने जाणवा. विषाण शब्द जो के
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