Book Title: Shrutsagar Ank 2007 03 012
Author(s): Manoj Jain
Publisher: Shree Mahavir Jain Aradhana Kendra Koba

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Page 133
________________ पंन्यास प्रवरश्री अमृतसागरजी आचार्यपद प्रदान महोत्सव विशेषांक ओसवालों के गोत्र व ज्ञातियाँ भारतवर्ष के इतिहास की सामग्री अभी भी गहन अन्धकार में डूबी हुई है. पुरातत्त्ववेत्ताओं के सैकड़ों वर्षों की खोज के बाद भी इसका बहुत बड़ा भाग अधूरा पड़ा है. आधुनिक अन्वेषणों से तथा पुरातत्त्ववेत्ताओं के सतत प्रयत्नों से कुछ टूटेफूटे शिलालेख, ताम्रपत्र, प्रशस्तियाँ आदि प्राप्त हुई हैं, जिनके आधार पर भारत वर्ष के राजनैतिक इतिहास पर काफी प्रकाश पड़ने लगा है. ओसवाल जाति के द्वारा किए गए महान कार्यों से राजपूताने का मध्यकालीन इतिहास देदीप्यमान हो रहा है तथा उस जाति में जन्म लेनेवाले महापुरुषों के नाम उस समय के इतिहास में स्थान-स्थान पर दृष्टिगोचर हो रहा है. ओसवाल जाति की उत्पत्ति के विषय में अनेक दन्तकथाएँ, अनेक किंवदन्तियाँ तथा अनेक काव्य प्राप्त होते हैं, परन्तु उनके आधार पर इस जाति की उत्पत्ति का समय निर्धारण करना अत्यन्त कठिन व दुरूह है. ओसवाल जाति की उत्पत्ति के विषय में वर्तमान में तीन मत विशेष रूप से प्रचलित हैं पहला मत जैन ग्रन्थों तथा जैनाचार्यों का है, जिसके अनुसार वीर निर्वाण सं. में अर्थात् विक्रम संवत् से लगभग वर्षों पूर्व भीनमाल के राजा भीमसेन के पुत्र उपलदेव ने ओसिया नगरी की स्थापना की. भगवान पार्श्वनाथ के सातवें पट्टधर उपकेशगच्छीय आचार्य श्री रत्नप्रभसूरिजी उस राजा को प्रतिबोध देकर उसे जैनधर्म की दीक्षा दी और उसी समय ओसवाल जाति की स्थापना की. दूसरा मत भाटों, भोजकों तथा सेवकों का है, जिनकी वंशावलियों से यह स्पष्ट होता है कि वि. सं. में उपलदेव राजा के समय ओसिया (उपकेश) नगरी में आचार्य श्री रत्नप्रभसूरि के उपदेश से ओसवाल जाति के अठारह मूल गोत्रों की स्थापना की गई. तीसरा मत आधुनिक इतिहासकारों का है, जिन्होंने सिद्ध किया है कि वि. स. के पूर्व ओसिया नगरी तथा ओसवाल जाति का अस्तित्व नहीं था. उसके बाद भीनमाल के राजा उपलदेव ने मंडोर के पड़िहार राजा के पास जाकर आश्रय ग्रहण किया तथा उसी की सहायता से ओसिया नगरी बसाई. सम्भवतः उसी समय से ओसवाल जाति की उत्पत्ति हुई हो. वि. स. का लिखा हुआ एक उपकेशगच्छ चरित्र नामक हस्तलिखित ग्रन्थ मिलता है, उसमें तथा अन्य ग्रन्थों में ओसवास जाति के उत्पत्ति के विषय में जो कथा मिलती है, वह इस प्रकार है वि. स. लगभग वर्ष पूर्व भीनमाल नगरी में भीमसेन नामक राजा राज्य करता था. उसके दो पुत्र थे- श्रीपुंज तथा उपलदेव. एक समय उन दोनों भाईयों के बीच कुछ विवाद हो गया तथा श्रीपुंज ने कहा- इसतरह का आदेश तो वही चला सकता है, जो भुजाओं के बल पर राज्य की स्थापना करे. यह ताना उससे सहन नहीं हुआ और वह उसी समय नए राज्य की स्थापना के उद्देश्य से अपने मन्त्रियों को साथ लेकर वहाँ से चल पड़ा. उसने डेलीपुरी (दिल्ली) के राजा साधु की आज्ञा लेकर मंडोवर के पास उपकेशपुर या ओसिया पट्टण नामक नगर बसाकर अपना राज्य स्थापित किया. उस समय ओसिया नगरी का क्षेत्रफल बहुत बड़ा था. कहा जाता है कि वर्तमान ओसिया नगरी से मील की दूरी पर जो तिवरी गाँव है, वह उस समय ओसिया का तेलीवाडा था तथा जो इस समय खेतार नामक गाँव है, वह पहले यहाँ का क्षत्रियपुरा था. राजा उपलदेव वाममार्गी था तथा उसकी कुलदेवी चामुंडा माता थी. उसी समय आचार्य श्री रत्नप्रभसूरिजी मुनियों के साथ उपकेशपट्टण पधारे तथा लूणाद्रि पर्वत पर तपश्चर्या करने लगे. कई दिनों तक जब मुनियों के लिए उस स्थान पर शुद्ध भिक्षा की व्यवस्था नहीं हो सकी तो उन्होंने वहाँ से प्रस्थान करने का निश्चय किया. परन्तु उसी समय चामुंडा माता ने प्रगट होकर आचार्य भगवंत से विनती की कि आपका यहाँ से चला जाना अच्छा नहीं होगा. यदि आप यहाँ पर अपना चातुर्मास करें तो संघ और शासन का बड़ा लाभ होगा. आचार्य भगवंत ने अपने शिष्यों से कहा कि जो साधु विकट तपस्या करनेवाले हों वे यहाँ ठहरें तथा शेष साधु यहाँ से प्रस्थान कर जाएँ. यह सुनकर साधु वहाँ से विहार कर गए 131

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