Book Title: Shravak Nitya Krutya
Author(s): Jinkrupachandrasuri
Publisher: Nirnaysagar Press
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(१३१) सणोकरि हरषहृदयधरि सतरे वरसउजमंताजी ॥ ३ ॥ दीवाली दिनअतिउछरंगे कल्पसुणो भविप्राणीजी, ठवणायरियनीपूजा करीने गौतमरासनीवाणीजी, ब्रह्मशान्तियक्षराज सिद्धायिका देवीसांनिधकारीजी, श्रीजिनकृपाचंद्रसरि सेवोदीवालिदिल धारिजी॥४॥ ॥ इति ॥
॥ अथ पुनमनी थुइ ॥ श्रीसिद्धाचलतीरथसेवो, तीनजगतमांदुजोनएवो, एहथी शुभफललेवो ॥ श्रीआदीश्वरजिनवरराया, पुर्वनीवाणुं इणगिरिआया, इंद्रादिकमनभाया ॥ श्रीपुंडरीकप्रथमगणधारी, पांच कोड़मुनिवरपरिवारी, अणसणकर्यो हितकारी ॥ फागुण पूनिम संलेखनाजाणो, चैत्रीदिननिरुपमगुणखाणो, पाम्या पदनिरवाणो ॥१॥ चैत्रीदिन देववंदनकीजे, भावसहित प्रभु पूजा रचीजे, जिनगुणगाइ जशलीजै ॥ तिलककरो प्रभुने दशवीश, चढता वलि तीश चालीस, पंचाशनी पूजा जगीश ॥ पुष्पअक्षतफलनेवेद्य सारजिनवरपूजा विविधप्रकार, धूपदीपमनुहार ॥ कलशअठोत्तरशत, पूजाकरिये, चोवीशजिनवरध्यानजधरिये, जिम भवसागरतरिये ॥२॥ चैत्रीदिन शुभवारमां लीजै, गुरुमुखथी ए तपऊचरीजै, विधिसहितवहीजै ॥ सोलवरस लग तप आराधि, आतमगुणनिज संपदा साधी, पावे सहजसमाधी ॥ तपपूरणउझमणोधारो, करिने सासन सोभावधारो, जिमहोवेनिस्तारो ॥ काउसग्गप्रदक्षिणा करिये, गुणणोगुणी जिनगुणसांभरिये, आगमविधिअनुसरिये ॥३॥ दोयटंकपड़िकमणो कीजे, चैत्री सेजुंजययात्राकरीजै,
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