Book Title: Samyaktva Kaumudi
Author(s): Jinharsh Gani, Vijayjinendrasuri
Publisher: Harshpushpamrut Jain Granthmala
View full book text
________________
सम्यक्त्वकौमुदी
प्रथमः प्रस्ताव
॥१४॥
KXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX
वाञ्छति स्वल्पकालेन पुमान् शिवफलानि यः। त्रिवेलं तेन यत्नेन पूजा कार्या जिनेशितुः॥१४७॥ जो पूएइ तिसंझं जिणिंदरायं तहा विगयदोस । सो तइयभवे सिज्झइ अह वा सत्तहमे जमे ॥१४८॥ एषा स्तोकाऽपि लोकानां विवेकेन कृता सती । महाफलाय जायेत काले जलदवृष्टिवत् ॥१४६ ॥ यतः
जिनपूजनं जनानां जनयत्येकमपि संपदः सकलाः ।
जलमिव जलदविमुक्तं काले शस्यश्रियो निखिलाः॥१॥ क्रूरकर्मद्रुमारामसमृलोन्मूलनक्षमा । पूजैव जगदैश्वर्यहेतुः सेतुर्भवाम्बुधौ ॥ १५० ॥
किं बहुनाऽर्हता पूजा बुधैरष्टविधा स्मृता । तत्तत्फलभरप्राप्तिव्यक्तमाहात्म्यशालिनी ॥ १५१ ॥ यतःपुष्पात्पूज्यपदं जलादिमलता सडूपधूमादिषवृन्दध्वंसविधिस्तमोपहननं दीपाद्धृतास्निग्धता । क्षेमश्चाक्षतपात्रतः सुरभिता वासात्फलादूपता, नृणां पूजनमष्टधा जिनपतेरौचित्यलभ्यं फलम् ॥१॥ द्रव्यभावप्रकाराभ्यां द्विधा संक्षेपतोऽर्चना । द्रव्यादनेकभेदा स्यादनन्ता भावतः पुनः ॥ १५२ ॥ आद्योत्कृष्टं फलं ख्यातमच्युतस्वर्गसंपदः । भावोत्कृष्टफलं त्वन्तमु हत्तेनापि नितिः ॥ १५३ ॥ यतःउक्कोसं दव्वथयं आराहियं जाइ अच्चुयं जाव । भावत्थएण पावइ अंतमुहूत्तेण निव्वाणं ॥२॥ एवमहेद्वचः श्रुत्वा कृत्वा मनसि वासनाम् । देवपूजाव्रतं लोकरनेकैः प्रत्यपद्यत ॥ १५४ ॥ कृत्यवित् श्रवणोत्तंसीकृत्य वीरजगद्गुरोः । वाचः सुधामुचश्चञ्चद्रोमाञ्चाञ्चितविग्रहः ॥ १५५ ॥
XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX
॥१४॥

Page Navigation
1 ... 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 113 114 115 116 117 118 119 120 121 122 123 124 125 126 127 128 129 130 131 132 133 134 135 136 137 138 139 140 141 142 143 144 145 146 147 148 149 150 151 152 153 154 155 156 157 158 159 160 161 162 163 164 165 166 167 168 169 170 171 172 173 174 175 176 177 178 179 180 181 182 ... 220