Book Title: Samyaktva Kaumudi
Author(s): Jinharsh Gani, Vijayjinendrasuri
Publisher: Harshpushpamrut Jain Granthmala
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सम्यक्त्व
कौमुदी
॥१३॥
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धन्यास्त एव भुवि देव ! तवांघ्रिसेवाहेवा किनो नवनवाद्भुतभावतो ये । मन्यामहे परममसमान देहभूभारभूतजनुषः खलु देहिनोऽन्यान् ॥ १३४ ॥ एवं स्तुत्वा जगन्नाथं नरनाथो यथोचितम् । अलश्चक्रे निजं स्थानं दिवस्पतिसमद्युतिः ॥ १३५ ॥ अदासादयः श्रेष्ठवृषभा वृषभाविताः । यथाक्रमं जिनं नत्वा दत्तानन्दमुपाविशन् ॥ १३६ ॥ पञ्चत्रिंशद्गुणोदारगिरा श्रुतिसुधा किरा । अथैवं विदधे धर्मदेशनां वीरतीर्थकृत् ॥ १३७ ॥ अस्मिन्नसारे संसारे मराविव सुरद्रुवत् । धर्मोऽयं भूरिभिर्भाग्यैः प्राणिभिः प्राप्यते परम् ॥ १३८ ॥ तस्योत्पत्तिमहीपीठं दुर्लभो नृभवो भवेत् । प्ररोहजनकं बीजं बोधिरेव बुधैः स्मृतः ॥ १३६ ॥ अनुकूलानिलः प्रायः सुसाधुगुरुसङ्गमः । विशालमालवालं च विवेको हृदि निर्मलः ॥ १४० ॥ भवेत्सद्दर्शनं शुद्धं मूलमायतिकारणम् । तत्त्वातत्त्वविचारस्तु बन्धुरस्कन्धबन्धति ॥ १४१ ॥ दानशीलतपोभावा मुख्यशाखा इमाः पुनः । प्रशाखा विदुषो ख्याताः समतामृदुतामुखाः ॥ १४२ ॥ पल्लवाः कमलोल्लासाः सकलाः सकला नृणाम् । असमानि सुमानि स्युर्नृ नाक सुखसंपदः ॥ १४३ ॥ शुक्लध्यान ऋतूलास सिद्धिसौख्यं फलं पुनः । कदाचिद्यद्रसास्वादे क्लेशलेशोऽपि नो भवेत् ॥ १४४॥ षड्भिः कुलकम् ॥ प्राप्तोऽपि धर्मकल्पदुरीदृशो भाग्ययोगतः । विना पयःप्रवाहेण भवेत्क्षीणः क्षणे क्षणे ॥ श्रीजिनेन्द्रार्चनानीरप्रवाहस्तु प्ररूपितः । अतो यत्नवता भाव्यं तत्र प्राणभृता भृशम् ॥
१४५ ॥
१४६ ॥
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प्रथमः प्रस्तावः
॥१३॥

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