Book Title: Samyaktva Kaumudi
Author(s): Jinharsh Gani, Vijayjinendrasuri
Publisher: Harshpushpamrut Jain Granthmala

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Page 15
________________ सम्यक्त्वकौमुदी प्रथमः प्रस्तावः RRRRRRRRXXXXXXXXXXXXXX इति चिन्ताश्चितस्वान्तो यावदग्रे व्रजत्यसौ । तावदालोकते स्मैवं विस्मयाविष्टमानसः ॥ ११५ ॥ छत्रत्रयं त्रिभुवनाद्भुतराज्यलीलासंसूचकं धवलचश्चलचामरालीः । इन्द्रध्वज विविधवर्णपताकिकाढ्य वप्रत्रयं रजतहेममणीमयं च ॥११६ ॥ सिंहासनं स्फटिकरत्नमयं सपादपीठं सुरासुरविचित्रविमानपङ्क्तिम् । चैत्यमं द्रतविमुद्रितविश्वतापं निस्तन्द्रचन्द्रवदनास्त्रिदशाङ्गनाश्च ॥ ११७ ॥ सर्वतु सत्कफलपुष्पभराभिराममाराममानमदनेकमहीरुहौषम । सोपानपद्धतिमनन्तपदाधिरोहनिश्रेणिकामिव विशेषविभक्तियुक्ताम् ॥ ११८ ॥ लोकत्रयोत्तमपवित्रचरित्रवन्तं देवाधिदेवममराधिपवृन्दवन्धम् । श्रीवर्द्धमानमसमानमहोदयिश्रीशोभायमानमभितश्च जगत्पुनानम् ॥ ११९ ॥ पञ्चभिः कुलकम् ।। व्यचिन्तीति पुनस्तेन विरोधिप्राणिसङ्गमः। यो दृष्टः कारणं तत्र प्रभावोऽस्य महेशितुः॥१२०॥ यतः सारङ्गी सिंहशावं स्पृशति सुतधिया नन्दिनी व्याघ्रपोतं, मार्जारी हंसवालं प्रणयपरवशा केकिकान्ता भुजङ्गम् । वैराण्याजन्मजातान्यपि गलितमदा जन्तवोऽन्ये त्यज्यन्ति, श्रित्वा साम्यकरूढं प्रशमितकलुषं श्रीजिनं क्षीणमोहम् ॥ १ ॥ KXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXI ११॥

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