Book Title: Samyaktva Kaumudi
Author(s): Jinharsh Gani, Vijayjinendrasuri
Publisher: Harshpushpamrut Jain Granthmala

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Page 16
________________ सम्यक्त्व कौमुदी ॥ १२ ॥ ********* अथैतन्मनुजेन्द्राय श्री जिनेन्द्रागमादिकम् । निवेद्य हृदयानन्दि कृतकृत्यो भवाम्यहम् ॥ १२१ ॥ फलपुष्प स्फुरत्पाणिर्वनपालस्ततः परम् । विज्ञो विज्ञपयामास गत्वा राज्ञे जिनागमम् ॥ १२२ ॥ कर्णामृतवं वर्णगुरुराकर्ण्य तद्वचः । सर्वाङ्गीणमलङ्कारं तस्मै मौलिं विना ददौ ॥ १२३ ॥ चतुरङ्गबलाकीर्णः संकीर्णा पृथिवीं सृजन् । एवं वव्राज राजेन्द्रः प्रणन्तुं प्रभुमादरात् ॥ २२४ ॥ न्यपतन् पत्तयः पूर्वं प्रभुप्राप्तप्रसत्तयः । तनुत्राणपवित्राङ्गाश्वित्रकृच्छस्त्रपाणयः ॥ १२५ ।। प्राचलन्नचलप्रायाः सच्छाया गजराजयः । पञ्चवर्णपताकाभिर्मण्डिताः खण्डितारयः ॥ १२६ ॥ हेपारवप्रतिच्छन्दैः स्वच्छन्दै रोदसीतले । शब्दाद्वैतकृतश्चेलु र्हरयोऽपि स्योद्भूताः ॥ १२७ ॥ रथाः पृथ्व्यां व्रजन्ति स्म जयलक्ष्मीमनोरथाः । स्वचक्रचक्रचीत्कारवाचालितदिगन्तराः ॥ १२८ ॥ चिल्लाद्या महादेव्यः सुखारूढसुखासनाः । ऐयरुः पुरतो वीरवन्दनायोत्सुका इव ॥ १२६ ॥ नाना तूर्यवैर्बन्दिश्रेणीजयजयारवैः । कर्णेऽपि पतितं नैव तस्मिन् शुश्राव कश्चन ॥ १३० ॥ अर्हद्दासोऽपि सर्वद्धर्या वन्दितुं जिनमाययौ । आनन्दोद्गतरोमाञ्चकञ्चुकश्चतुराग्रणीः ॥ १३१ ॥ अथ प्रदक्षिणीकृत्य श्रेणिकः श्रीजिनेश्वरम् । स्तौति स्म भूयसी भक्तिभक्तभव्यभयापहम् ॥ १३२ ॥ अद्य भवत्त्रिभुवनाधिपते ! त्वदीयपादारविन्द विधिवन्दनकर्मणा मे । सद्धर्मबान्धव ! महीधवधोरणीभिः पूज्याधुना नरभवः सफलोदयश्रीः ॥ १३३ ॥ **** ********** प्रथमः प्रस्तावः ॥ १२ ॥

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