Book Title: Pratikraman Sutra
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek
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५७६
प्रतिक्रमण सूत्र. पसिको ॥चउदह विद्या विविह रूव, नारीरस विको ॥ विनय विवेक वि चार सार, गुणगणह मनोहर ॥ सात हाथ सुप्रमाण देह, रूपें रंजावर ॥३॥ नयण वयण कर चरण जिण, विपंकज जल पाडिय ॥ तेजें ताराचंद सूर, आकास नमामिय ॥ रूवें मयण अनंग करवि,मेदिह नि रधामिय ॥ धीरमें मेरू गंजीर सिंधु, चंगमचयचाडिय ॥ ॥ पेखवी निरु वम रूव जास, जिण जंपे किंचिय ॥ एकाकी किल जीत श्न, गुण मेव्हा संचिय ॥ अहवा निश्चे पुत्र जम्म, जिणवर इण अंचिथ ॥ रंजा पउमा गौरी गंगा, रतिहा विधि वंचिय ॥५॥ नहिं बुध नहिं गुरू कवि न कोइ, जसु आगल रहियो ॥ पंचसया गुणपात्र गत्र, हिंडे परवरियो ॥ करे निरंत र यज्ञकर्म, मिथ्यामति मोहिय ॥ण उल होशे चरम नाण, दंसण ह विसोहिय ॥ ६ ॥ वस्तु छंद ॥ जंबूदीवह जरह वासंमि, खो णीतल मंमणो ॥ मगध देस सेणिय नरेसर, वरगुवर गाम तिहां ॥ विप्प वसे वसुनू सुंदर, तसु नजा पुहवी सयल, गुण गण रूव निहाण ॥ ताण पुत्त विद्यानिल, गोयम अतिहि सुजाण ॥ ७॥ नाषा ॥ चरम जिणेसर केवल नाणी, चनविह संघपश्वा जाणी ॥ पावापुर सा मी संपत्तो, चनविह देव निकायें जुत्तो ॥ देवें समवसरण तिहां कीजें, जिण दी मिथ्यामति खीजें ॥ त्रिजुवनगुरू सिंहासण वश्चगे, तत खिण मोह दिगंतें पश्ठो ॥ ए ॥ क्रोध मान माया मद पूरा, जाये नाग जिम दिन चोरा ॥ देवउंउहि आकाशे वाजी, धर्म नरेसर आवियो गाजी ॥ १० ॥ कुसुमवृष्टि विरचे तिहां देवा, चोशठ इंछ जसु मागे सेवा ॥ चा मर बत्र सिरोवरि सोहे, रूपेंहि जिणवर जग सहु मोहे ॥ ११ उवसम रस जर जरी वरसंता, जोजन वाणी वखाण करंता ॥ जाणवि वझमाण जिण पाया, सुर नर किन्नर आवे राया ॥ १२ कतिसमूहें ऊलफलक ता, गयण विमाणे रण रणकंता ॥ पेख वि इंदनू मन चिंते, सुर आवे अम्ह जगन होवंते ॥ १३ ॥ तीर तरंमक जिम ते वहता, समवसरण पहोता गहगहता ॥ तो अनिमाने गोयम जपे, इणि अवसरे को तणु कंपे ॥ १४ ॥ मूढ लोक अजाणिलं बोले, सुर जाणंता श्म कांश मोले ॥ मुंआगल कोश् जाण नणीजें, मेरु अवर किम उपमा दीजें ॥ १५ ॥ ॥ वस्तुबंद ॥ वीर जिणवर वीर जिणवर नाण संपन्न ॥ पावा पुरिसुरम
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