Book Title: Pratikraman Sutra
Author(s): Shravak Bhimsinh Manek
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

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Page 616
________________ प्रतिक्रमण सूत्र. रे ॥ श्री० ॥३॥ कालें दूधथकी दहीं थाये, कालें फल परिपाक रे॥ विविध पदारथ काल उपावे, कालें सहु थाय खाख रे ॥ श्री० ॥४॥ जिन चोवीश बार चक्रवर्ती, वासुदेव बलदेव रे ॥ कालें क्वलित कोई न दीसे, जसु करता सुर सेव रे ॥ श्री० ॥ ५॥ उत्सर्पिणी अवसर्पिणीधारा, बए जुई जु नात रे ॥ षड़झतुकाल विशेष विचारो, निन्न निन्न दिन रात रे॥ श्री० ॥ ६ ॥ काले बाल विलास मनोहर, यौवन काला केश रे॥ वृक्ष पण वली पली वपु अति पुर्बल, शक्ति नहिं लवलेश रे ॥ श्री० ॥७॥ ॥ ढाल वीजी ॥ गिरुया गुणवीरजी ॥ ए देशी ॥ ॥ तव वनाववादी वदे जी, काल किस्युं करे रंक ॥ वस्तुखजावें नीपजे जी, विणसे तिमज निःशंक ॥ सुविवेक विचारी, जु जुर्म वस्तु खन्नाव ॥ १॥ ए आंकणी ॥ ते योग जोबनवती जी, वांजणी न जणे बाल ॥ मुख नहिं महिलामुखें जी, करतल उगे न वाल ॥ सु० ॥५॥ विण खनाव नवि नीपजे जी, केम पदारथ कोय ॥ आंब न लागे लींबडे जी, बाग वसंतें जोय ॥ सु०॥३॥ मोरपिल कुण चीतरे जी, कोण करे संध्यारंग ॥ अंग विविध सवि जीवनां जी, सुंदर नयन कुरंग ॥ सु०॥४॥ कांटा बोर बबुलना जी, कोणे अणीयाला कीध ॥ रूप रंग गुण जूजुआ जी, तरु फल फूल प्रसिझ॥ सु० ॥५॥ विषधर मस्तक नित्य वसे जी, मणि हरे विष ततकाल ॥ पर्वत थिर चल वायरो जी, ऊर्ध्व अग्निनी ज्वाल ॥ . सु० ॥ ६ ॥ मत्स्य तुंब जलमा तजे जी, बूडे काग पहाण ॥ पंखी जात गयणे फिरे जी, श्णी परें सयल विनाण ॥ सु० ॥ ७॥ वायु गुग्थी उप शमे जी, हरडे करे विरेच ॥ सीजे नहिं कण कांगडू जी, शक्ति खन्नाव अनेक ॥ सु ॥ ७॥ देश विशेषे काष्ठना जी, नूमिमां थाय पहाण ॥ शंख अस्थिनो नीपजे जी, देत्र खनाव प्रमाण ॥ सु० ॥ ए ॥ रवि तातो शशी शीतलो जी, नव्यादिक बहु नाव ॥ बए अव्य आप आपणांजी, न तजे कोई खनाव ॥ सु ॥ इति स्वजाववादः ॥ ॥ ढाल त्रीजी ॥ कपूर होय अति उजलो रे ॥ ए देशी ॥ काल कीश्युं करे बापमो जी, वस्तु स्वनाव अकऊ ॥ जो नवि हो ये लवितव्यता जी, तो केम सीके कऊ रे ॥ प्राणी म करो मन जंजाल, जाविजाव निहाल रे ॥प्राणी म॥१॥ ए आंकणी ॥ जलनिधि तरे जं Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org


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