Book Title: Prakarana Ratnakar Part 2
Author(s): Bhimsinh Manek Shravak Mumbai
Publisher: Shravak Bhimsinh Manek

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Page 332
________________ ३१२ अध्यात्ममतपरीदा. गमिकमयुक्तिसंगतं वागमेह्यत्यंतोदयः सातस्य केवलिन्यनिधीयते. युक्तिरपि घा तिकर्मक्ष्याहानादयस्तस्या अनूवन् वेदनीयोनवायाःहुधः किमायातं येनासौन न वति न तपोबायातपयोरिव सहानवस्थानलक्षणो विरोधो नापिनावानावयो रिव परस्परपरिहारेण लक्षणकचिदिरोधोस्तीति सातासातयोश्चांतर्मुहूर्तपरि वर्तमानतया यथा सातोदय एवमसातोदयोपीति अनंतवीर्यत्वं सत्यपि शरीरब लापचयकुवेदनीयोनवा पीडा च नवत्येव नचाहारग्रहणे किंचित्दीयते. के वल महोपुरुषिकामात्रमेवेति पंचाशीतिर्जर वस्त्रप्रायाः शेषासयोगिनि. " एवं जे गुणस्थानककमारोहमां कयुंजे, ते तो थोडी स्थितिनी अपेदाए जा एवं ; पण रसनी अपेदाए न जाणवू. केमके, सत्तानी प्रकृति तो एवी कही, पण उदयनी प्रकृति एवी कही नथी. उलटो तीर्थकरनामप्रमुखनो प्र बल नदयज कह्यो. एम जागीने "अतएव दग्धरकल्पेन नवोपग्राहिकल्पना पि सता केवलिनोपि न मुक्तिमासादयेयुः " ए आवश्यकबहत्तिनुं वचन जे, ते जोईने पण व्यामोह करवो नही. तेटला माटेज इहां पण स्थितिनी अपेक्षाएम केवलीने कर्म दोरडीना जेवां कह्यांचे. “अतएव नवोपयाहित्वाल्पग्राहित्व विशेषणं" कह्यांले. एवं अमने प्रतिनासेले. वली विशेष गीतार्थनेविषे जेम पूर्वापरविरोध न थाय, तेम विचारवं. केटला एक प्रमेयकमलमातमना अनिप्रायने अनुसरीने आवीरीते कहेले के, अपूर्वकरणगुणताणाए पापप्रकृतिनो रस कस्यो, मा टे केवलीने तथाविध सातोदय थाय नही. मोहसापेदप्रकति थाय. तेनो मोह ना घातथी अवश्य घात थायजे. अन्यथा पराघातनामकर्मना उदयथी केवली परहननादिक केम न करे ! ए बोलवू पण दुराग्रहनुं जाणवू, केमके, जेम रसनो घात थायडे, तेम स्थितिनो पण घात थायले. माटे जो रस प्रोडो थतो होय तो स्थिति पण थोडी थवी जोये. जेम बक्ष्यमानकर्मनी स्थिति घटी जाय तेम ब ६यमान कर्मनो रस पण घटी जाय, एज समाधान. तथा पराघातनामकर्म नुं फल केवलीने थायज, थने परहनन तो मोहविना थाय नही. केटलाएक एम कहे के वेदनीय कर्म केवलीने विषे हतवीर्य में, माटे तेनेविषे दुधादिक परी सह बायारूप जे. एम जे केवलीनेविषे कहे तेणे श्वेतांबरनी प्रक्रिया जाणी नथी, ए म जाणवू. केटलाएक कहे के, केवलीनेविषे उदीरणाविना प्रचुर पुजल आवता नथी, माटे असातावेदनीयोदय बली दोरडीना जेवोज जे. एबोल पण अविचार | रूप जे. केमके, एवीरीते तो सातावेदनीयोदय पण मंद होवो जोये. इत्यादिक Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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