Book Title: Muni Sabhachand Evam Unka Padmapuran
Author(s): Kasturchand Kasliwal
Publisher: Mahavir Granth Academy Jaipur

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Page 542
________________ ४५६ पमप्रामा राम द्वारा मुनी बोक्षा होना मुनिवर का पाया उपदेश । रघुपति भए दिगंबर भेस ।। राज दोष तजि साधं जोग । छोडे सकल जाति का भोग ॥५५५६।। श्रीमती पास अजिका भई। बाईस विध सौं परिस्या सहीं ।। अवधिग्यांन रघुपति को भया । धर्म उपदेस घरण नै दिया ।।५५६।। सो बरषा लगि रहे कुमार । तीन में जन्म पिता की लार ॥ चारि सहस्त्र वरष मुनि साध । ग्यारह सहस्र पांच सो प्रडसठि बाधि ॥५५६१॥ इतना राज करना मन ल्याइ । पचीस वरप में केवल उपाइ । एक महरन ने बारह वरण । करी तपस्था मन में हरप ॥५५६२।। वोटा खरा समझि तन भेद । मिथ्यातम का किया विछेद ।। धरमरीत समझाब' ग्यांन । मिथ्या माने जे अम्यान ।।५५.६३।। जन घरम की निंदा करें । ते मिथ्याती नरकां प. ।। बहु तूनै समकित पद गया । पानी का संसा नहीं रहा ।।५५६४।। सोरठा सरव आउषो सत्रहे हजार, अनैं पांच वरष ।। रामचंद्र जगदीश, प्रतिबोधे भविजन घणें ॥ घरमा ध्यान इह ईस, ते महिमा कहाँ लग गिणे ॥५५६५।। इति श्री पपपुराणे श्रीराम मिःक्रमण विधान ११२ वां विधानक चौपई राम की सपस्या प्रातम ध्यान करै रामचन्द्र । वाणी सुरण त होई आनंद ।। इनके गुण अति प्रगम अपार । राम नाम विभुवन प्राधार ॥५५६६।। रसनां कोटिक कर बखान | उनके गुण का मत न ांन । इन्द्र धरणेन्द्र जे प्रस्तुति करै । ते नहीं वोड प्रत निस्वर ।।५५६७।। छ? अहिने निमित्त प्राहार । नदसतल नगरी के मझार ।। रिय की जोतिन का परताप । महा मुनीस्वर सोम प्राप ।।५५६८।। ईरज्या समिति सौ गजगति चाल । मानौं मेर सुवरसन हाल ।। सो में कंचन बरण सरीर । उमरे लोग भई अति भीर ॥५५६६॥

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