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श्रीकल्प
सूत्रे ।।३५२ ।।
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पुरुषसिंहेभ्यः पुरुषवर पुण्डरीकेभ्यः पुरुषवरगन्धहस्तिभ्यः लोकनाथेभ्यः लोकहितेभ्यः लोकप्रदीपेभ्यः लोकप्रद्योतकरेभ्यः अभयदयेभ्यः चक्षुर्दयेभ्यः मार्गदयेभ्यः शरणदयेभ्यः जीवदयेभ्यः बोधिदयेभ्यः धर्मदयेभ्यः धर्मदेशकेभ्यः धर्मनायकेभ्यः धर्मसारथिभ्यः धर्मत्ररचातुरन्तचक्रवर्तिभ्यः द्वीपः त्राणं शरणं गतिः प्रतिष्ठा श्रमतिहत- वरं - ज्ञान - दर्शन - घरेभ्यः व्यावृत्तच्छद्मभ्यः जिनेभ्यः जापकेभ्यः तीर्णेभ्यः तारकेभ्यः बुद्धेभ्यः बोधकेभ्यः मुक्तेभ्यः मोचकेभ्यः सर्वज्ञेभ्यः सर्वदर्शिभ्यः शिवमचलमरुजमनन्तमक्षयमव्यावाधमपुनरावृत्ति सिद्धिगतिनामधेयं स्थानं सम्प्राप्तेभ्यः । नमो जिनेभ्यो जितभयेभ्यः ।
नमोऽस्तु खलु श्रणाय भगवते महावीराय पूर्वतीर्थङ्करनिर्दिष्टाय यावत् सम्प्राप्तकामाय । वन्दे खल ही बोध को प्राप्त, पुरुषों में उत्तम, पुरुषों में श्रेष्ठ श्वेतकमल के समान, पुरुषों में उत्तम गंधहस्ती के समान, लोक में उत्तम, लोक के नाथ, लोक के हितकर, लोक में प्रदीप के समान, लोक में प्रकृष्ट उदयोत करने वाले, अभयदाता, नयनदाता, मार्गदाता, शरणदाता, बोधिदाता, धर्मदाता, धर्म के उपदेशक, धर्म के नायक, धर्म के सारथी, चारगतियों के अंत करने वाले होने से धर्मचक्रवर्त्ती, (संसारी जीवों के लिए ) द्वीप, त्राण, शरण, गति और प्रतिष्ठा स्वरूप, अमतिहत उत्तम ज्ञान और दर्शन को धारण करने वाले, छद्म (घातिक कर्मों) से रहित, राग-द्वेष आदि को जीतने वाले और जिताने वाले, स्वयं तिरे हुए और को तारने वाले, स्वयं बोध को प्राप्त और दूसरों को बोध देनेवाले, स्वयं मुक्त और दूसरों को मुक्त करने वाले, सर्वज्ञ, सवदर्शी, शिव, अचल, रुज (रोगरहित), अनन्त अक्षय अव्यावाध तथा पुनरागमन से रहित सिद्धिगति नामक स्थान को प्राप्त भयों को जीत लेने वाले जिन भगवन्तों को नमस्कार हो ।
दूसरों
नमस्कार हो श्रमण भगवान् महावीर को, जिनका पूर्ववर्त्ती तीर्थंकरों ने निर्देश किया है और जो સિંહ સમાન, પુરુષોમાં શ્વેતકમલ સમાન, પુરુષામાં ઉત્તમ ગાંધહસ્તી સમાન, લેાકમાં ઉત્તમ, લેકના નાથ, લેાકडितपुर, बोडी, बोम्म प्रष्ट उद्योत उरनार, अलयहाता, नयनहाता भाग होता, श्ररभुद्धाता, मोधिहाता, धर्मछाता, धर्भाश, धर्म नायक, धर्म सारथी, धर्मावर्त्ती, संसारी वाने भाटे द्वीप समान, त्राणु, शरण, प्रति ठा३य, प्रतिडत - ज्ञानदर्शन स्व३यी, छट्टभ-घाती भोथी रहित, रागद्वेषने तवावाजा भने तापवादाणा, तरबु તારણ, સ્વયં ખેાધને પ્રાપ્ત કરનાર અને બીજાને કરાવનાર, પોતે મુક્ત અને બીજાને મુક્ત કરાવનાર, સર્વજ્ઞ, સ हशी, शिव, अन्यक्ष, अरु-रोगरहित अक्षय, अव्यामाध, पुनरागमन रहित सेवा सिद्धिगति नामवाणा स्थानने પ્રાસ, જીતભયી, એવા જન ભગવન્તને નમસ્કાર હો. શ્રમણ ભગવન્ત મહાવીરને નમસ્કાર હો ! જેના નિર્દેશ
कल्प
मञ्जरी
टीका
शक्रेन्द्र
कृत- भगवत्स्तुतिः ।
॥३५२॥
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