Book Title: Kalpasutram Part_1
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti Rajkot

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Page 526
________________ श्रीकल्पसूत्रे ॥५१३॥ Jain Education Int भविष्यति । तथा - विविध - कठिन - कठिनतर- कठिनतमा - भिग्रह - नानाविध - घोर तपश्चरणेन - विविधाः = अनेकविधा ये कठिनकठिनतरकठिनतमाः अभिग्रहाः, तथा - नानाविधानि - घोराणि - दुश्चराणि च यानि तपांसि तेषां चरणेन= आचरणेन हेतुना दग्धेन्धन-निर्धूम-ज्वलित हुतवह- सदृशतेजाः - दग्धानि =ज्वलितानियानि इन्धनानि तत्र स्थितो धूमवर्जितो ज्वलितः=प्रदीप्तो यो हुतवहः अग्निः, तत्सदृशं तेजो यस्य स तथा - जाज्वल्यमान- निर्धूम-हिसदृश इत्यर्थः, तथा-भवोपग्राहि-कर्मक्षपक- लेश्यातीता-प्रकम्पपरमनिर्जराकारण सूक्ष्मक्रियाऽनिवर्ति-नामतृतीयशुक्लध्यानेनभवोपग्राहीणि=भवकारणानि यानि कर्माणि तेषां क्षपकं क्षयकारि लेश्याऽतीतम् = लेश्याऽतिक्रान्तम् अमकम्पम् = अविचलं परमनिर्जराकारणम् = आत्यन्तिकनिर्जरायाः कारणं सूक्ष्मक्रियाऽनिवर्त्तिनाम - मक्ष्मा क्रिया वाङ्मनोयोगनिरोधे सत्यपि सूक्ष्मकाययोगस्य निरोधाभावाद् यत्र तत् सूक्ष्मक्रियं तच्चादः अनिवर्त्ति = प्रवर्धमानतरपरिणामाद्रव्यावर्त्तनशीलं च, तन्नाम यस्य तत्तथाविधं यत् तृतीयशुक्लध्यानं तेन करणभूतेन निश्शेषितकर्ममलकलङ्क: तथा विविध भाँति के उग्र तपों का आचरण करके दहकती हुई और धम से रहित अग्नि के समान तेजस्वी होगा। वह संसार अर्थात् जन्म-मरण के कारणभूत कर्मों का क्षय करनेवाले, श्या (कषाय से युक्त योग की प्रवृत्ति) से रहित अविचल, उत्कृष्ट निर्जरा के हेतु 'सूक्ष्मक्रियाऽनिवर्ति' नामक शुक्लध्यान के तीसरे पाये से समस्त कर्ममलरूपी कलंक का क्षय कर देगा । वचन और मन का निरोध हो जाने पर सूक्ष्मकाययोग का निरोध न होने से सूक्ष्म क्रिया ही शेष रह जाती है, इसलिये वह ध्यान सूक्ष्मक्रिय कहलाता है। उस अवस्था में परिणामों की धारा तीव्रता के साथ बढ़ती ही चली जाती है, अत एव वह ध्यान अनिवर्त्तनशील होता है । इस कारण वह सूक्ष्मक्रिय - अनिवर्त्तिध्यान कहलाता है । इस ध्यान से समस्त પ્રકારના ઉગ્ર તપનું આચરણ કરીને સળગતી અને ધુમાડા વિનાની અગ્નિ જેવા તેજસ્વી થશે. તે સસાર એટલે જન્મ-મરણના કારણભૂત કર્મના ક્ષય કરનાર થશે. અને લેશ્યા (કષાયવાળી ચેાગની પ્રવૃત્તિ)થી રહિત, અવિચળ, निष्ट निरानु र " सुक्ष्मक्रियाऽनिवर्त्ति ” नामनां शुद्ध ध्यानना श्री पायाथी समस्त भ भ इथी કલંકનેા ક્ષય કરી નાખશે. વચન અને મનને નિધ થઈ જતાં સૂક્ષ્મ કાયયેાગના નિરોધ ન હોવાથી સૂક્ષ્મ ક્રિયા રહે છે, તેથી તે ધ્યાન સૂક્ષ્મક્રિય કહેવાય છે. તે અવસ્થામાં પરિણામેાની ધારા તીવ્રતાની સાથે વધતી જ જાય છે, તેથી તે ધ્યાન અનિવત્તનશીલ હોય છે. તે કારણે તે સૂક્ષ્મક્રિય-અનિવત્તિ ધ્યાન કહેવાય છે. તે ધ્યાનથી સર્વે कल्प मञ्जरी टीका निर्धूमाग्निस्वप्नफलम्. ॥५१३॥ w.jainelibrary.org

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