Book Title: Kalpasutram Part_1
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti Rajkot

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Page 528
________________ श्रीकल्पसूत्रे ॥५१५॥ Jain Education Inte अवितहमेयं सामी ! असंदिद्धमेयं सामी ! इच्छियमेयं सामी ! पडिच्छिय मेयं सामी ! इच्छियपडिच्छियमेयं सामी ! सच्चे णं एस श्रट्टे से जहेयं तुन्भे वदहति कट्टु ते सुमिणे सम्मं पडिच्छर, पडिच्छित्ता सिद्धत्थेणं रन्ना अन्भणुन्नाया समाणी नानामणिरयणभत्तिचित्ताओ भद्दासणाओ अट्ठे, अब्भुट्टित्ता अतुरिय-मचवल - मसंभंताए अविलंबियाए राजहंससरिसीए गईए जेणेव सए सयणगिहे तेणेव उवागच्छर, उवागच्छित्ता मा णं इमे एयारूवा महामुमिणा श्रन्नेहिं पावसुमिणेहिं पडिहम्मिमुचि कट्टु देवगुरुधम्मसंबद्धाहिं पसत्याहिं धम्मियाहिं कहाहिं धम्मजागरियं जागरमाणी विरइ ||०४५ || कृत्वा छाया - ततः खलु सा त्रिशला क्षत्रियाणी हृष्टतुष्टा चित्तानन्दिता हर्ष - शविसर्पद्धृदया करतलपरिगृहीतं शिरस्यावर्त मस्तकेऽञ्जलिं एवमवादीत्-एवमेतत् स्वामिन्! तथ्यमेतत् स्वामिन् ! अवितथमेतत् स्वामिन्! असन्दिग्धमेतत् स्वामिन्! इष्टमेतत् स्वामिम् ! प्रतीष्टमेतत् स्वामिन् ! इष्ट प्रतीष्टमेतत् स्वामिन् ! सत्यः खलु एषोऽर्थः तद् यथैतद् यूयं वदथ इति कृत्वा तान स्वमान् सम्यक् प्रतीच्छति, प्रतीष्य मूल का अर्थ- 'तए गं सा' इत्यादि । तत्पश्चात् त्रिशला क्षत्रियाणी, सिद्धार्थ राजा के पास से इस अर्थ (फल) को सुनकर, समझकर हर्षित और सन्तुष्ट हुई। उसका चित्त आनन्दित हुआ । हर्ष से उसका हृदय विकसित हो गया। उसने दोनों हाथ जोड़ कर मस्तक पर आवर्त एवं अंजलि करके इस प्रकार कहा - हे स्वामिन्! ऐसा ही है । हे स्वामिन् ! यह सत्य है । हे स्वामिन्! यह असत्य नहीं है । हे स्वामिन् ! आपका कथन सन्देह - रहित है । हे स्वामिन् ! यह इष्ट है । हे स्वामिन् ! यह पुनः पुनः इष्ट है । हे स्वामिन्! यह एक बार और बार-बार इष्ट है। आप जो कहते हैं सो अर्थ सत्य ही है।' इस प्रकार कहकर वह उन स्वप्नों भूलना अर्थ - 'तपणं सां' इत्याहि सिद्धार्थ शब्द पासेथी, स्वप्नइलो लयी, त्रिशला राखी, घी हर्षित અને સંતુષ્ટ થઈ. તેનું ચિત્ત આનંદ પામ્યું. હ થવાથી હૃદય પણ ફૂલાયુંને મન પ્રફુલ્લિત થયું. બે હાથ જોડી, મસ્તક પર અંજલી કરી, ખેાલી-હૈ સ્વામિન્! તમે કહેા છે તે પ્રમાણે છે, ખરેખર સત્ય છે. જરા પણ અસત્ય, નથી. ાપનું કથન સંદેહરહિત છે. તેમજ ઇષ્ટકારી છે. સ્વપ્ન અર્થ ખરાખર છે. આમ કહીને, For Private & Personal Use Only कल्प मञ्जरी टीका त्रिशलायाः स्वमापतिधातार्थ जागरणम्. ॥५१५॥ www.jainelibrary.org.

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