Book Title: Kalpasutram Part_1
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti Rajkot

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Page 563
________________ SHARA श्रीकल्प सूत्रे नामन्तिके समीपे एतमथ श्रुत्वा निशम्य हृष्टतुष्टचित्तानन्दितः हर्षवशविसर्पद्धृदयः तान् स्वमपाठकान् एवं वक्ष्यमाणं वचनम् अबादीत-हे देवानुप्रियाः! एवमेतत् यथा भवद्भिरुक्तम् एवमेव एतत्स्वमफलं भावि, एतेन स्वमपाठकवचने विश्वासः प्रकाशितः, एतदेव स्पष्टीकरोति-तथैवैतव हे देवानुमियाः ! यूयं यथा प्रतिपादयथ तथैव एतत् स्वप्नफलं भावि-इत्यन्वयतः स्वप्नपाठकवचनसत्यतोक्ता, अथ व्यतिरेकतस्तद्वचनसत्यतामाह-अवितथमेतत्-हे देवानुपियाः ! एतत् भवदुक्तं स्वप्नफलम् अवितथम् नासत्यं किन्तु सत्यमेव, हे देवानुपियाः! एतत् भवतां वचनम् असन्दिग्धं-सन्देहरहितम्, हे देवानुपियाः! एतत् स्वप्नफलम् इष्टम् अस्माकमीप्सितम् , तथा-हे देवानुमियाः! एतत् स्वप्नफलं प्रतीष्टम्-विशेषतो वाञ्छितम् , अथेष्टत्व-प्रतीष्टत्वधर्मद्वयेनात्य कल्पमञ्जरी टीका 1॥५५॥ सिद्धार्थ राजा स्वप्नपाठकों से यह अर्थ सुनकर और हृदय में धारण करके हृष्ट-तुष्ट हुए। उनका चित्त आनन्दित हो गया। हर्ष से हृदय की कली-कली खिल गई। उन्होंने स्वप्नपाठकों से इस प्रकार कहा-'हे देवानुप्रियो ! बात ऐसी ही है, अर्थात् स्वमों का यही फल होने वाला है।' यह कह कर राजा ने स्वमपाठकों के वचन पर विश्वास प्रकट किया। इसी बात को स्पष्ट करते हैं-हे देवानुप्रियो! आप जो कहते हैं सो सत्य है-जैसा फल आप बतलाते हैं, वैसा ही होगा। इस प्रकार अन्वय (विधि) रूप से स्वम्पाठकों के कथन की सत्यता बतलाई । यही बात व्यतिरेक (निषेध) रूप से कहते हैं-'हे देवानुपियो! आपका कहा स्वमफल असत्य नहीं, किन्तु सत्य ही है। हे देवानुप्रियो! आपका कथन शंकारहित है। हे देवानुप्रियो ! यह स्वमफल हमारे लिए इष्ट है। हे देवानुपियो! यह स्वप्नफल खूब इष्ट है।' अत्यन्त आदर स्वप्नफल विषये सिद्धार्थानु मोदनम् સિદ્ધાર્થ રાજા સ્વખપાઠકે પાસેથી આ અર્થ સાંભળીને અને હૃદયમાં ધારણ કરીને હર્ષ તથા સંતેષ પામ્યા. તેમનું ચિત્ત પ્રસન્ન થયું. હર્ષથી હદયની કળી કળી ખીલી ઊઠી. તેમણે સ્વનિ પાઠકને આ પ્રમાણે કહ્યું—“હે દેવાનુપ્રયે! વાત એવી જ છે. એટલે કે સ્વપ્નનું એ જ ફળ મળવાનું છે.” આમ કહીને રાજાએ સ્વપ્ન પાઠકનાં વચન પર વિશ્વાસ પ્રગટ કર્યો. એ જ વાતને સ્પષ્ટ કરે છે–“હે દેવાનુપ્રિયે! આપ જે કહે છે તે સત્ય છે. જેવું ફળ આપ બતાવે છે તેવું જ ફળ પ્રાપ્ત થશે.” આ રીતે અન્વય (વિધિ) રૂપથી સ્વપ્ન પાઠકનાં કથનની સત્યતા બતાવી. એ જ વાત વ્યતિરેક (નિષેધ) રૂપથી કહે છે-“હે દેવાનુપ્રિયે! આપે કહેલ સ્વપ્નફળ ॥५५०॥ Jain Educationalitingale . . ... ....... .

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