Book Title: Kalpasutram Part_1
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti Rajkot

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Page 542
________________ श्रीकल्प कल्पमञ्जरी टीका ॥५२९|| लनि शयनीयादत्तियति. उत्थाय स्नातः काबलिकर्मा कृतकौतुलमङ्गलपायश्चित्तः सर्वालङ्कारविभूषितः यं बाहोरस्थानशाला तत्रैव उपागम्य सिंहासनवरगतः पौरस्त्याभिमुवः संनिषण्णः ॥मू०४७॥ टीका--'तए णं से सिद्धत्थे' इत्यादि। ततः आस्थानमण्डपमुसज्जीकरणानन्तरम् स सिद्धार्थो राजा कल्ये श्व: 'कलं' इत्यत्र प्राकृतत्वात् सप्तम्यर्थे द्वितीया, प्रादुःप्रभातायां-पादु प्रकाशितं प्रभातं यस्यां तस्यां रजन्यांनी सत्याम, अथ अनन्तरं पु.ल्लोत्पलकमलकोमलोन्मीलिते-फुल्लोत्पलं विकसितकमलं कमलो=3 दुरिणविशेष तयोः कोमल मृदु उन्मीलनम् कमलदलानां विकसनं हरिणनेत्रागामुन्मेषणं च यस्मिंस्तथाभते. आपाण्डुरे-आसमन्तात् पाण्डुरे-धीतधवले प्रभाते-पातःकाले च सति, अथ अनन्तरं च रक्ताशोकप्रकाशकिंशुकशुक्म वगझारागबन्धुजीवकपारावतचलननयनपरभृतसुरक्तलोचनजपाकुसुमज्वलितज्वलनतपनीयकल 18ङ्गलकनिकररूपातिरेकराजमानस्वश्रीके-तत्र-रक्ताशोकस्य प्रकाशः प्रभा, किंशुका=पलाशः, शुभमुखं, गुञ्जाद्धरागः-गुञ्जा-कलविशेषः तस्य होने पर राजा सिद्धार्थ शय्या से उठे, उठ कर बलिकर्म किये। कौतुक, मंगल और प्रायश्चित्त किया। सब अलंकारों से विभूषित हुए। फिर जहाँ बाहर का आस्थानमण्डप था, वहाँ जाकर पूर्व दिशा की ओर मुंह करके उत्तम सिंहासन पर बैठे ॥मू०४७॥ बीका का अर्थ-'तए णं से सिद्धत्थे' इत्यादि। आस्थानमण्डप सुसज्जित कर दिया गया। कल हो गया-नया दिन रात्रि समाप्त हो गई और प्रभात चमक उठा। कमल खिल गये-कमलों के कोमल दल पाइप तथा कमल अर्थात् हिरणों के नेत्र विकसित हो गए। प्रभात पूर्णरूप से पाण्डर (पीत-धवल) हो गया। इसके बाद लाल अशोक की प्रभा, पलाशपुष्प, तोते की चौच, गुंजाफल के अर्द्ध प्रभात वर्णनम् ॥५२९॥ હર અહિ કય'. કૌતુક, મંગળ અને પ્રાયશ્ચિત્ત કર્યું. બધા આભૂષણેથી વિભૂષિત થયા પછી જયાં બહારની રાજસભા હતી. ત્યાં જઈને પૂર્વ દિશાની તરફ મુખ કરીને ઉત્તમ સિંe સન પર બેઠાં (સૂ૦૪૭). -से सिद्धत्थे त्याlt. मास्थानभ७५ (NAGI) सुसाra ४२वाभां माव्या. नवा विस २३५ये। રવિ પુરી થઈ અને પ્રભાત ચળકવા લાગ્યું. કમળ ખિલી ગયાં. કમળાના કૅમળ દળ વિકાસ પામ્યા, તથા કમળ એટલે કે હર નાં નેત્રો વિકસિત થઈ ગયો. પ્રભાત પૂર્ણોરૂપથી પાંડુર-(પીત-ધવળ) થઈ ગયું. ત્યારબાદ લાલ અશેકની જ પ્રભા, કેશડા. પોપટની ચાંચ, ચણોઠીના અર્ધભાગની રતાશ, બધુજીવક (બપિરિયાનું ફૂલ), કબૂતરને પગ Jain Education Ind en! For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.

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