Book Title: Kalpasutram Part_1
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti Rajkot

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Page 532
________________ श्रीकल्प 11५१९॥ तत्र गत्वा इमे एतद्रपाबाजादिरूपाः महास्वमाः अन्यः =इतरः पापस्वमः अशुभस्वनः मा प्रतिघातिषतर प्रतिहता न भवन्तु इति कृत्वा एवं पर्यालोच्य देवगुरुधर्मसंबद्धाभिः देवगुरुधर्मयुक्ताभिः प्रशस्ताभिः धार्मिकोभिः= धर्मयुक्ताभिः कथाभिः धर्मजागरिकां जानती धर्मजागरणं कुर्वती विहरति । अत्र देवगुरुधर्मसम्बद्धा धार्मिककथा एवं विज्ञेयाः। तथाहिदेवकहा-“दाणाइ-अंतराया, पंच ण जस्सत्थि हासरइअरई। भयं तहेव य सोगो, तमहं सरणं पवजामि ॥१॥ जस्स न होइ दुगुंछा, कामो मिच्छत्तमेवमन्नाणं। धम्मस्स सत्थवाहं, तमहं सरणं पवजामि ॥२॥ अविरइ निद्दा रागो, दोसो एएहि विष्पमुक्को जो। अहिदेवं अरिहंतं, तमहं सरणं पवजामि ॥३॥ ॥ इइ देवकहा ॥ __ छाया-( देवकथा) “दानाद्यन्तरायाः, पञ्च न यस्य सन्ति हासरत्यरतयः। भयं तथैव च शोकः, तमहं शरणं प्रपद्ये ॥१॥ __ आदि के महास्वप्न दूसरे अशुभ स्वप्नों से नष्ट न होजाएँ अर्थात् इनका फल नष्ट न हो ऐसा सोच कर वह देव, गुरु, धर्म संबंधी प्रशस्त और धार्मिक कथाओं का अवलंबन करके धर्म-जागरणा करती हुई विचरती है। यहाँ देव गुरु और धर्म से सम्बन्ध रखने वाली कथाएँ ऐसी समझनी चाहिएબીજાં અશુભ સ્વપન વડે નાશ ન પામે એટલે કે તેમનું ફળ નાશ ન પામે એવું વિચારીને તે દેવ, ગુરુ, ધર્મ સંબંધી પ્રશસ્ત અને ધાર્મિક કથાઓ કરીને ધમ–જાગરણ કરતી વિચરે છે, અહીં દેવ, ગુરુ અને ધર્મ સાથે સંબંધ રાખનારી કથાઓ આવી સમજવી જોઈએ— देवकथा ॥५१९॥ Jain Education Hanational For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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