Book Title: Kalpasutram Part_1
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti Rajkot

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Page 537
________________ 'सग्गापवग्ग' इत्यादि। यो धर्मः नित्य-सदा स्वर्गापवर्गतालकमोद्घाटनकुञ्चिका, तथा बोधिवीजनिदान-बोधिबीज सम्यक्त्वं तनिदानं तदादिकारणं चास्ति स धर्मोऽस्माकमस्ति ॥२॥ किं बहुगा' इत्यादि। धर्मस्य बहुना अधिकवर्णनेन किन किमपि, यो जनो यद् यद् इच्छति-वाछति तस्य-इष्टस्य अखिलस्य सर्वस्य सम्पूर्तिः सम्यक्त्वेन पूरणं येन धर्मेण समन्तात् परितो भवति-जायते स धर्मोऽस्माकमस्ति ॥३॥ इति धर्मकथा |मू०४५।। मूलम्--तए णं से सिद्धत्थे खत्तिए राया पच्चूसकालसमयंसि कोडंबियपुरिसे सदावित्ता एवं क्यासी-खिप्पामेव भो देवाणुप्पिया! बाहिरियं उठाणसालं अज सविसेसं परमरम्मं गंधोदगसित्तसंमन्जिओवलित्तसुइयं पंचवन्नसरससुरहिमुक्कपुप्फपुंजोक्यारकलियं कालागुरुपवरकुंदुरुक्कतुरुक्कधूवडझंतमघमघंतगंधुद्धयाभिरामं सुगंधवरगंधियं गंधवहिभूयं करेह य कारवेह य, एयमाणत्तियं पचप्पिणेह । तए णं ते कोडंबियपुरिसा सिद्धत्थेणं रन्ना एवंवुत्ता समाणा इतुटा रायकहियाणुसारेण बाहिरिय उवट्ठाणसालं पुव्वुत्तपगारं करिता य कारवित्ता य एयमाणत्तियं पञ्चप्पिणंति ॥मू०४६॥ छाया-ततः खलु स सिद्धार्थः क्षत्रियो राजा प्रत्यूषकालसमये कौटुम्बिकपुरुषान् शब्दाययित्वा एवमवादीत-क्षिप्रमेव भो देवानुपियाः ! बाह्यामुपस्थानशालामद्य सविशेषं परमरम्यां गन्धोदकसिक्तसम्मानितो जो धर्म सदैव स्वर्ग और मोक्ष की कुजी है और जो बोधिवीज (सम्यक्त्व) का आदि कारण है, वही हमारा धर्म है ॥२॥ धर्म का अधिक वर्णन करने से क्या लाभ? मनुष्य जिस जिस वस्तु की कामना करता है, उस सब इष्ट की जिससे सम्यक् प्रकार से पूर्ति होती है, वही हमारा धर्म है ॥शामू०४५॥ । मूल का अर्थ-'तए णं से सिद्धत्थे' इत्यादि। तत्पश्चात् सिद्धार्थ राजा ने प्रातःकाल होने पर अपने कौटुम्बिक-आज्ञाकारी-पुरुषों को बुलाकर इस प्रकार कहा જે ધર્મ હમેશા સ્વર્ગ અને મોક્ષની ચાવી છે અને જે બેધિબીજ (સમ્યકત્વ)નું આદિકારણુ છે, તેજ અમારો ધર્મ છે (૨), ધમનું વધારે વર્ણન કરવાથી શું લાભ! મનુષ્ય જે જે વસ્તુની ઈચ્છા કરે છે, તે બધી ઇછિત વસ્તુઓની જેનાથી સારી રીતે પૂતિ થાય છે, એજ અમારે ધમ છે (૩) (સૂ૦૪૫) . भूजन। अर्थ-तपण से सिद्धत्थे त्याहि त्या२ मा सिद्धार्थ क्षत्रिय शनये प्रात: यता पोताना કૌટુમ્બિક-આજ્ઞાકારી-પુરુ ને બેલાવીને આ પ્રમાણે કહ્યું-“હે દેવાનુપ્રિય! જલદી બહારના આસ્થાનમંડ૫ धर्मकथा से ॥५२४॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.iainelibrary.org

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