Book Title: Kalpasutram Part_1
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti Rajkot
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श्रीकल्प
सूत्रे
॥४८७॥
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藏藏塡頻頻頻
पाणि यानि कमलानि तेषां विकासकः, तथा-भव्य- हृदय - वुहर - चरा - नन्त - प्रचण्ड - मार्तण्ड - मण्डल - तरुणकिरण - दुर्भेदचिरन्तना - ऽनादि - गाढ - मिथ्यास्व - तिमिर - प्रणाशकः - तत्र - भव्यानां हृदयान्येव कुहराणि - गुहाः, तत्र चरतीति तादृशं यत् अनन्तम्- अरधिरहितं प्रचण्ड मार्तण्डमण्डलतरुग किरणदुर्भेदं - प्रखर सूर्यमण्डलमौढ किरणैरपि भेत्तु - मशक्यं चिरन्तनं = बहुकालस्थितम् अनादि = आदिरहितं गाढं निविडं मिथ्यात्वतिमिरं = मिथ्यात्वरूपोऽन्धकारः तस्य प्रणाशकः = निवारकः, तथा धर्मगगनाङ्गणे-जिनशासनाकाशे साक्षात् अतिशयतेजःपुञ्ज इव सूर्य इव भविष्यति ||० ३७॥
८-झयसुमिणफलं
झयदंसणेणं अमू समारूढ - मुकझाण-गयराओ सम्मष्णाणेग मंतिणा उत्रसम - मद्दव - ऽज्जव - संतोस - रूविपीए चरंगिणीए सेणाए पंचमहव्वयरूवेहिं भडेहिं समदमाइरूवेहिं सत्थत्थेहिं जुत्तो मुणिराम अष्णाणमंतिसहायं कोइमाणमायालोहच उरंगिणियं णाणावरणिज्जाइभडाणुगयं रागदोसरून सत्थत्थज् सं दुज्झाणगयारूढं मोहरायं निणिar केवलणाणावरण निस्सारणावतिष्ण-कारणक्कमत्रवहाणाऽनियहि-सयललोगालोग विसय-तिकालस्सहाव - परिणामभेयाणंत पयत्थसक्खंकारि - केवलणाण के बलदंसणसंपन्नो वेरग्गपत्र पेरियं सियवायज्झयं समुच्चाळिस्सइ ॥ पू० ३७॥
सित करेगा, तथा (३) भव्य जीवों के अन्तःकरणरूपी गुफा में रहने वाले, निरवधि प्रखर सूयों की प्रौढ़ किरणों द्वारा भी जिसका भेदन होना असंभव है, ऐसे चिरकाल से स्थित अथवा अनादिकालीन सघन मिथ्यात्व रूपी अंधकार को नष्ट करने वाला होगा। तथा (४) जिनशासनरूपी आकाश में साक्षात् अतिशय तेजःपुंज सूर्य के समान होगा ||० ३७||
ભવ્ય જીવેાના અન્તઃકરણરૂપી ગુફામાં રહેનાર, અસીમ પ્રખર સૂર્યના પ્રૌઢ કિરણા વડે પણ જેને ભેદવા અશકય છે, એવા ચિરકાળથી રહેલા, અથવા અનાદિ કાળના-ગાઢ મિથ્યાત્વરૂપી અંધકારના નાશ કરનાર થશે. તથા [૪] જિનશાસનરૂપી આકાશમાં સાક્ષાત્ અતિશય તેજના પુત્ર સૂર્યના જેવા થશે. (સ્૦૩૭)
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कल्प
मञ्जरी
टीका
सूर्यव
फलम्.
॥४८
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