Book Title: Kalpasutram Part_1
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti Rajkot

View full book text
Previous | Next

Page 505
________________ श्रीकल्प र द्वाणीगुण-प्रतिपूर्णी लोकाभिरामः धवलकीर्ति-केवलज्ञान-केवलदर्शन-समलङ्कृतः जगद्धृदयहरणमवणः सकल तीथिकानां मू|परि विराजमानः सकलजनानामभिलपणीयो भविष्यति ॥सू० ३९॥ ____टोका-'पुण्णकलसदसणेणं' इत्यादि । पूर्णकलशदर्शनेन जलपूर्णकलशस्वप्नदर्शनेन असौ विमलसंलिलै = कर स्वच्छ नलैः कलश इव, क्षमा-शान्ति-माधु-दार्य-शौर्य-गाम्भीर्य-धैर्य-मार्दवा-जवादि-गुणैः-तत्र क्षमा-शान्तिः क्रोधाघभावः, शान्तिः उपशमः, माधुर्यम्=स्वभावमधुरता, औदार्य-धानशीलता, शौर्य-पराक्रमः, गाम्भीर्यम्= गम्भीरता-हृदयस्यागाधता, धैर्यधीरता-परीषदोपसर्गसह ने निश्चलता, मार्दवं मृदुता-माननिग्रहः, आजवं-सरलता, सुत्रे ॥४९२॥ सब लोगों के हृदय-कमल में स्थित होगा। वाणी के पैंतीस गुणों से सुशोभित होगा। लोक में या लोगों के लिए रमणीय होगा। शुभ्र कीर्ति तथा केवलज्ञान और केवलदर्शन से विभूषित होगा। जगत के चित्त को हरण करने वाला होगा। समस्त तीथिको में प्रधानरूप से शोभायमान होगा और सकल जनों के लिये इष्ट होगा ।सू०३९॥ पूर्णकलशस्वमफलम् ____टीका का अर्थ- 'पुष्णकलसदसणेणं' इत्यादि। जल से भरे हुए कलश का स्वप्न देखने से, स्वच्छ जल से जसे कलश परिपूर्ण होता है, वैसे हो वह बाला , शांति, स्वभाव की मधुरता, उदारता, दानशीलता, शूरतापर.क्रम, गंभीरता-हृदय की अगाधता, धीरता-परीपह और उपसर्ग सहने में अटलता, मृदुता-मान का अभाव, ऋजुता પરિપૂર્ણ હશે. મંગળમય હોવાને કારણે સંપૂનું લેકનું મંગળ કરનાર હશે. બધા લોકેના હૃદય-કમળમાં સ્થાન પામશે. વાણીના પાંત્રીશ ગુણેથી સુશોભિત હશે. લેકમાં અથવા લોકેને માટે સુંદર હશે. શુભ્ર કીર્તિ તથા કેવળજ્ઞાન અને કેવળદર્શનથી વિભૂષિત હશે. જગતનું ચિત્ત હરનાર થશે, સમસ્ત તર્થિકમાં પ્રધાન રૂપથી શોભાયમાન થશે અને સઘળા જનેને માટે ઈષ્ટ થશે (સૂ૦૩૯). सानो भय'पुण्णकलसदसणे.णं' त्याहिथी सरेशनु नवाथी,२५२७ पाथीभय ભરેલા હોય છે. તેમ તે બ ળક પણ ક્ષમા, શાંત સ્વભાવની મધુરતા, ઉદારતા-દનશીલતા, શતા-પરાક્રમ, ગંભીરતા-હદયની અગાધતા, પીરતા-પરીષહ અને ઉપસર્ગ સહન કરવાની અડગતા, મૃદુતા-માનના અભાવ, રાજુલા-સરળતા વગેરે વગેરે Jain Education Informonal For Private & Personal Use Only ॥४९२॥ છે www.jainelibrary.org

Loading...

Page Navigation
1 ... 503 504 505 506 507 508 509 510 511 512 513 514 515 516 517 518 519 520 521 522 523 524 525 526 527 528 529 530 531 532 533 534 535 536 537 538 539 540 541 542 543 544 545 546 547 548 549 550 551 552 553 554 555 556 557 558 559 560 561 562 563 564 565 566 567 568 569 570 571 572 573 574 575 576 577 578 579 580 581 582 583 584 585 586 587 588 589 590 591 592 593 594