Book Title: Kalpasutram Part_1
Author(s): Ghasilal Maharaj
Publisher: Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti Rajkot

View full book text
Previous | Next

Page 462
________________ मूत्रे कल्पमञ्जरी टीका मारा जलजन्तुविशेषाः 'सोंस' इति ख्याताः, तेषां वार-समूहः तिमयः, तिामाङ्गलाः, तामाङ्गलागलाश्च मत्स्यविशेषाः, तेषां यत् चपलं शीघ्रम् उच्छलनम् उद्गमनम्, तेन चोक्षुभ्यमाणा पुनः पुनः क्षुभ्यन्तः क्षोभ प्रामुवन्तो राजमानाः शोभमानाः असमानाः असाधारणाश्च ये कल्लोला: महातरङ्गाः, तत्र-पोप्लयमानः संतरन् श्रोकल्प यादःसमुदया जलजन्तुसमूहो यस्मिस्तम्, तथा संमिल-नाना-नदी-जलो-ल्लस-समुदयं-संमिलन्त्यः सङ्गता भवन्त्यो याः नानानद्यः अनेकनद्यः तासां यानि जलानि तैः उल्लसन शोभमानः समुदयः अभ्युदयो वृद्धिर्यस्य ॥४४९॥ तम्, तथा-सर्वतः सर्वप्रकारेण समन्तात्-चतुर्दिक्षु समुच्छल-त्तरलतरो-तुङ्ग-तरङ्गा-नुतरङ्ग-समुच्छलन्त उद्गच्छन्तः तरलतराः अतिचपलाः उत्तुङ्गाः-उन्नताः तरङ्गानुतरङ्गाः-तरङ्गपरम्परा यत्र तम्, तथा-रङ्गत्तरङ्गभङ्ग-रगन्तः शनैः शनैश्चलन्तः तरङ्गभङ्गाः-तरङ्गभेदाः यत्र तम्, तथा-पटु-पवना-ऽऽइति-समुच्छल-ज्जल-तरङ्ग-परम्परा-संघट्टिततट-परावृत्त-लोललहरी-लसित-फेनिल-पयो-ललिता-न्तराळ-तत्र-पटवः पबला ये पवनाःवायवस्तेषां या आहतिः आघातः, तया समुच्छलन्ती-उद्गच्छन्ती जलतरङ्ग परम्परा-जलतरङ्गमाला, तया संघट्टिताः= संघर्ष प्राप्ताः तटपरावृत्तातोरान्नित्ताः लोला:-चचलाश्च या लहयः = महातरङ्गास्ताभिलसितंशोभितं फनिलं = फेनयुक्तं च यत् पयोजलं तेन ललितं = शोभनम् अन्तराल = मध्यभागो उसमें उपर उछलते थे। इन सबके उछलने से उस सागर में असाधारण तरंगें उत्पन्न होती थीं। उन तरंगों में नाना प्रकार के जलजन्तु उतराते थे। उस सागर में बहुत-सी सरिताओं (नदियों) का संगम होता था, और उस संगम के कारण उसके जल का अभ्युदय हो रहा था। उसमें सर्वत्र और सभी तरह लहरों पर लहरें लहरा रही थीं। वह हल्की-हल्की तरंगों की छटा से युक्त था। प्रबल पवन के आघात से एक तरंग उठती, उससे दूसरी तरंग उत्पन्न होती, इस प्रकार तरंगों की परम्परा पैदा हो जाती थी । वह तरंगपरम्परा जाकर किनारे से टक्कर खाती थी। इस टक्कर से जो चंचल लहरें उत्पन्न होती थीं, उनके लौटने से जल में फेन उत्पन्न होते थे। इन फेनों से युक्त जल के कारण सागर का मध्यभाग बड़ा ही मुहावना ઉછળવાને કારણે તે સાગરમાં અસાધારણ લહે ઉત્પન્ન થતી હતી તે લહેરેમાં વિવિધ પ્રકારનાં જળતુઓ ઉભરાતાં હતાં તે સાગરમાં ઘણી નદીઓનો સંગમ થતું હતું, અને તે સંગમને લીધે તેના પાણીમાં વધારે થતા હતા. તેમાં સર્વત્ર અને બધી તરફ લહેર પર લહેરો ઉછળતી હતી. તે નાનાં નાનાં તરંગોની છટાવાળે હતે. પ્રબળ પવનના આઘાતથી એક લહેર પેદા થતી, તેમાંથી બીજી લહેર પેદા થતી, એ રીતે લહેરાની પરંપરા પેદા થતી હતી. તે તરંગપરંપરા જઈને કિનારાની સાથે અથડાતી હતી. આ અથડાટથી જે ચંચળ લહેરો ઉત્પન્ન થતી કરે છે તે પાછી ફરવાથી પાણીમાં ફીણ ઉત્પન્ન થતાં હતા. તે ફીણવાળા જળને લીધે સાગરને મધ્યભાગ ઘણું જ સુંદર क्षीरसागर स्वामवर्णनम्. ॥४४९॥ Jain Education International For Private Personal use only www.jainelibrary.org

Loading...

Page Navigation
1 ... 460 461 462 463 464 465 466 467 468 469 470 471 472 473 474 475 476 477 478 479 480 481 482 483 484 485 486 487 488 489 490 491 492 493 494 495 496 497 498 499 500 501 502 503 504 505 506 507 508 509 510 511 512 513 514 515 516 517 518 519 520 521 522 523 524 525 526 527 528 529 530 531 532 533 534 535 536 537 538 539 540 541 542 543 544 545 546 547 548 549 550 551 552 553 554 555 556 557 558 559 560 561 562 563 564 565 566 567 568 569 570 571 572 573 574 575 576 577 578 579 580 581 582 583 584 585 586 587 588 589 590 591 592 593 594