Book Title: Jain Jivan
Author(s): Dhanrajmuni
Publisher: Chunnilal Bhomraj Bothra

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Page 88
________________ जैन-जीवन ग्रह धारण कर रखा था। वह यह था-(२) देनेवाली सदाचारिणी हो । (२) राजकन्या हो । (३) खरीदी हुई हो। (४) उसका सिर मुंडा हुआ हो । (५) एक मात्र लंगोटी पहने हो। (६) हाथों में हथकड़ी हो । (७) पैरोंमे बेड़ी हो (5) उसका एक पैर देहलीके बाहर हो और एक अन्दर हो। (१०) छाजके 'कोनेमें उड़दके चाकुले हों। (११) प्रसन्न हो । (१२) आंखोंमें आंसू हों। (१३) तीसरा पहर हो- ये तेरह बाते मिलेंगी तो ही मैं पारणा करूँगा, अन्यथा छ महीनों तक अन्न-पानी नहीं लू गा! । - आंसू नहीं थे पॉच मास पच्चीस दिन बीत चुके थे इधर सती चन्दनवाला उन उड़दके वाकुलोंको हाथमें लेकर भावना भा रही थी कि कोई त्यागी-तपस्वी मुनि आ जाए, तो पहले उन्हें कुछ देकर पीछे पारणा करू। अचानक भगवान् पधार गए। देखते ही चन्दनवाला हर्प-विभोर हो गई और प्रार्थना करने लगी-तारिए भगवन् ! तारिए इस अनाथ बालिकाको । प्रभुने देखा तो सब बोल मिल रहे थे, लेकिन आंखोंमे आंसू नहीं थे अतः प्रभु वापस फिर गए । वस, फिरते ही वालिका रोने लगी और कहने लगीप्रभो ! क्या आप भी मुझे इस विपत्तिमे छोड़कर जा रहे हैं ? दीनबन्धों' दया कीजिए एव मेरे हाथोंसे उड़दके वाकुले लीजिए ! अभिग्रह फल गया चन्दनवालाकी आखोंमे आंसू आते ही अभिग्रह फल

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