Book Title: Jain Jivan
Author(s): Dhanrajmuni
Publisher: Chunnilal Bhomraj Bothra

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Page 112
________________ जैन-जीवन जाता था। मसारके सब जीवोंसे खमत-वामना करता था, लेकिन उदायन नामसे नहीं करता था। ऐसे अनन्तानुवन्धी-क्रोधके कारण वह पूर्वोक्त क्रिया-काण्ड करता हुआ भी मिथ्याष्टि बन गया एवं चिराधक होकर संसारमें भटक गया। सम्पन्न -

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