Book Title: Jain Dhatu Pratima Lekh Part 1
Author(s): Kantisagar
Publisher: Jindattsuri Gyanbhandar

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Page 111
________________ परिशिष्ट ] [ 1 "चौमुखजी से तिल मांहे भीतर पासे माहिली भमती चौमुखजी ने पासे प्रतिमा..... .१ जंत्र २ दादेजीरा चरण रूपेरा १ पंचतीर्थीरी सिवासोमजी नी मूरत" बाहिर मण्डप तिनरी विगत प्रतिमा ३ पाषानी काठ के मन्दिर में है । १ यंत्र तांबेरो "प्रकार" "ह्रींकार" प्रतिमा २६, २ गट्टा | नवपदरा चांदिरा, एक मूरति हाथी पर चांदिनी, १ पंचतीर्थी, ३ प्रतिमा सर्वधातरी देहर है वारणे गोमुखयक्ष चकेसरी है I ऊपर तिगरी विगत--- संवत् १८६३ शाके १७५८ प्रवर्तमाने माषसित १० बुधवासरे श्रीपादलिप्तनगरे गोहल श्रीकांधाजी कुँअरनोंपणजी तत् कुँअर परतापसिंघजी विजयराज्ये सुमतिनाथबिम्बं कारितं श्री वृहत्खरतरगच्छे म० श्रीजिनहर्षसूरिजी" आगे मंडोरीयेरो नामौ है । एनामो भगवानजीरेनीचे उर भगवानजीरेनीचे पटड़ी है तिनरी विगत संवत् १८६८ नामि वैषाख वदि ५ गुरुवासरे श्री विक्रमपुर वास्तव्यः उसवालजातीय वृद्धशाखायां निरखोशाखा धाडीवाल गोत्रे ० भीखणदासजी तत् भार्या कुंदनाबाई तत्पुत्र श्र े० दीपराजजी, आधुनिक दक्षिण ( ? बरार ) देशे श्रीएलचपुरवास्तव्य, तस्य माजी कुँदनाबाई श्रीसिद्धाचलजी यात्रा करणे कुँ आए, उदार चित्त से सप्तक्षेत्रे धनव्याप्त श्रीचौमुखऊपर दक्षिणदिशि गवाक्ष कारितं श्रीश्रदिजिनबिम्बं स्थापितं च बृहत्खरतर गच्छे भ० श्रीजिनहर्षसूरिजी विजयराज्ये श्रीजिनसौभाग्यसूरिजी विजयराज्ये वा० कल्लीजी शि० पं० जयवन्तजी शि० पं० देवचंदजी शि० पं० प्रेमचन्दजी तत् भ्राता पं० हीराचन्द्र प्रतिष्ठितं मत स्वामी श्री श्री सुपार्श्वनाथजी । "Aho Shrut Gyanam"

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