Book Title: Digambar Jain 1923 Varsh 16 Ank 11
Author(s): Mulchand Kisandas Kapadia
Publisher: Mulchand Kisandas Kapadia

View full book text
Previous | Next

Page 19
________________ (१७) दिगंबर जैन । . xxxkkX****XX** शौच कहा है) *.. करना (व्यवहार में स्नान आदि करनेको भी * दशलक्षण धर्म। उत्तम सत्य-पच बोटना, झूठ न Wwxxxxxxxxxxx बोलना, कठोर वचन न कहना, दूसरोंके दुःख देनेवाली बात न कहना, चुगली न करना, व्यर्थ उत्तम खम मद्दउ अज्जवं सच्चउ पुण सउच्च संजम सुतओ। बवाद न करना, किसीकी हंसीन करना, आदि । चाउ वि आकिंचण भवभय बंचणवभं चरू धम्म जु अखओ। ६ उत्तम संयम-अपनी इंद्रियों को वश में जिस वस्तुका स्वभाव है वही उसका धर्म है । जैसे अग्निका करना व विषयों की ओर प्रवृत्ति होनेसे रोकना, । चलने-फिरने, स्वमाव गर्मी, जलका स्वभाव ठंडक है। इसी उठने-बैठने, धरने-उठाने प्रकार जो आत्माको कर्म मलसे रहित करके आदिमें किसी प्रकारका जीव घात न हो, ऐसे परिणाम रखना। उसका वास्तविक स्वमाव ( अनंतदर्शन, अनंतज्ञान, अनंतवीर्य, अनंतसुख ) प्राप्त करावे, वही ___७ उत्तम तप-तप २ प्रकारका है। आत्माका धर्म है। (१) बाह्यतप-(१) लौकिक हानि-लाभकी श्री पाचार्य कहते हैं कि इस अक्षय के इच्छा न करके संयमकी वृद्धि के लिये उपवास दश भेद हैं जिनके पालन करनेसे कर्मोका नाश करना (१) उक्त प्रयोजनकी सिद्धि व ध्यानकी व सच्चे सुख की प्राप्ति होती है। एकाग्रताके लिये भूखसे कम खाना (३) मुनिका १ उत्तम क्षमा-दुष्टोंके दुर्वचन कहने, भोजन के लिये जानेको ग्राम, घर आदिकका तिरस्कार करने, हंसी उड़ाने, मारने, दुःखी नियम करना, (४) इन्द्रय र नियम करना, (४) इंद्रियों को दमन करनेके करने आदि पर भी अपने पजिम में लिये षटरसोंको या उनमेंसे किप्ती किसीको का न लाना । और कर्मों का फल नानकर समता छोड़ते रहना (५) नहां ध्यान स्वाध्यायमें विघ्न के भावपूर्वक सहना । " कारण न हों, ऐसे एकान्त स्थानमें सोना बैठना, २ उत्तम मार्दव-सबके साथ नम्रतासे (६) शरीरसे ममता दूर करनेके लिये कायोत्सर्ग वर्तना और अपनी १ जाति, २ कुल, ३ सुंद- करना, अर्थात् गर्मी सर्दीकी परीपह सहा, नदी रता, ४ धन, ५ विद्या, ६ ज्ञान, ७ काम व-८ किनारे पहाड़ आदि पर तप करना । शूरवीरतापर किसी प्रकारका अमिमान न करना। (२) अतरङ्ग तप-(१) लगे हुए दोर्जेको । ३ उत्तम मार्जव-हृदयमें किसी प्रकारका दण्ड लेकर निर्मल करना, (२) सम्यग्चारित्रकी कपट न रखना, मर-वचन-कायकी कुटिलताको तथा इनके धारकों की विनय करना, (३) मुनिदूर करना । आर्निका, श्रावक-श्राषिका, रोगी व वृद्ध उत्तम शौच-लोमका न होना, मन, मुनिकी सेवा व सहायता करना (४) शास्त्रोका बचन, कायकी शुद्धिके लिये संतोषका ग्रहण यथारीति अध्ययन करना, (१) शरीरसे ममत्व

Loading...

Page Navigation
1 ... 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 33 34 35 36