Book Title: Daulat Bhajan Saurabh
Author(s): Tarachandra Jain
Publisher: Jain Vidyasansthan Rajasthan

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Page 184
________________ ( १०९ ) हे नर, भ्रमनींद क्यों न छांडत दुखदाई। सेवत चिरकाल सोंज, आपनी मूरख अध कर्म कहा, भेदै नहिं लागै दुखवालकी न, देहकै जमके रव बाजते, सुभैरव अति त्यागते, प्रान अनेक पर को अपनाय आप-रूपको विषय दारु जार, चाहदाँ करन अब सुन जघान, जिनवान, राग-द्वेषको मोक्षरूप निज पिछान 'दौल', भज विरागताई ॥ ४ ॥ हे नरः ॥ हे मनुष्य तू दुःख देनेवाली भ्रम-' -भुलावे की नींद को क्यों नहीं त्यागता ? तू चिरकाल से, अनादिकाल से उन विचारों को रखे हुए हैं अर्थात् बनाए हुए है जिसमें तेरी अपनी ही ठगाई है, नुकसान है । - गाजते, सुनै कहा न भाई ॥ २ ॥ हे नरः ॥ भुलाय अरे मूर्ख, ये पाप कर्म की कथा हैं जिनका तूने भेदन नहीं किया, जिनका मर्म नहीं जाना। इन दुखों की ज्वाला से देह नहीं तपती आत्मा तपती है अर्थात् दुःख की अनुभूति आत्मा को होती है, जो भावों के कारण होती है । जघान ठगाई ॥ हे नर. ॥ मर्म लहा, तत्ताई ॥ १ ॥ हे नर. ।। मृत्यु के आगमन के खूब बाजे बज रहे हैं, खूब शोर हो रहा है और बढ़ता जा रहा है, भैरव आदि की ध्वनियाँ गूंज रही हैं, अनेक लोग अपने प्राण त्याग रहे हैं, तू यह सब क्यों नहीं सुन रहा क्यों नहीं जान रहा अर्थात् तू मौत की आहट क्यों नहीं सुनता ? १६२ पर को अपनाकर तू अपना स्वरूप भूल बैठा है और दारुण विषयों से ही प्रीति/मित्रता/ याराना कर रहा है जिससे तृष्णा बढ़ती जाती है। दौलतराम कहते हैं - अब तू जिनवाणी को सुन, उसे हृदय में धारण कर 1 राग-द्वेष की जघन्यता जानकर अब मोक्षस्वरूप अपने आपको पहचान और वैराग्य की आराधना कर वैराग्य धारण कर । - हाय, बढ़ाई ॥ ३ ॥ हे नरः ॥ - जनन्य, निम्न, त्याज्य; सोंज सोज विचार 1 - = दौलत भजन सौरभ

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