Book Title: Daulat Bhajan Saurabh
Author(s): Tarachandra Jain
Publisher: Jain Vidyasansthan Rajasthan

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Page 200
________________ (१२२) मनवचतन करि शुद्ध भजो जिन, दाव भला पाया। अवसर मिलै नहिं ऐसा, यो सतगुरु गाया॥ वस्यो अनादिनिगोद निकसि फिर, थावर देह धरी। काल असंख्य अकाज गमायो, नेक न समुझि परी॥१॥ चिंतामनि दुर्लभ लहिये ज्यौं, त्रसपर-जाय लही। लट पिपिल अलि आदि जन्ममें, लहयो न ज्ञान कहीं॥२॥ पंचेन्द्रिय पशु भयो कष्ट , तहां न बोध लह्यो। स्वपर विवेकहित बिन संयाय, निशदिन भार वह्यो॥३॥ चौपथ चलत रतन लहिये ज्यौँ, मनुजदेह पाई। सुकुल जैनवृष सतसंगति यह, अतिदुर्लभ भाई॥४॥ यौं दुर्लभ नरदेह कुधी जे, विषयनसंग खोवैं। ते नर मूढ अजान सुधारस, पाय पांव धोवै॥५॥ दुर्लभ नरभव पाय सुधी जे, जैन धर्म से। 'दौलत' ते अनंत अविनाशी, सुख शिवका वेवै॥६॥ हे मानव ! मन, वचन और काय से श्री जिनेन्द्र का भजन करो, मनुष्यभव का यह अच्छा अवसर मिला है। सत्गुरु कहते हैं कि ऐसा सु-अवसर फिर सहजतया नहीं मिलेगा। हे जीव ! तू अनादि काल तक निगोद पर्याय में रहा, फिर वहाँ से निकल कर स्थावर पर्याय में देह धारण की। इस प्रकार बिना किसी आत्मलाभ के असंख्यात काल व्यतीत किया और अपने भले की बात ही नहीं समझ सका। जिस प्रकार चिंतामणि रत्न दुर्लभ है, उसे पाना कठिन है उसी प्रकार बड़ी कठिनाई से त्रस पर्याय मिली और जिसमें लट, पिपिल, भौंरा आदि रूप में जन्म लिया, देह धारण की, परन्तु कहीं भी ज्ञान नहीं हुआ। . १७८ दौलत भजन सौरभ

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