Book Title: Bhisshaka Karma Siddhi
Author(s): Ramnath Dwivedi
Publisher: Ramnath Dwivedi

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Page 718
________________ ६६८ भिपकर्म-सिद्धि ४ दो-तीन वर्ष पुराने सेमल के मूल का चूर्ण ६ मागे तथा मुसली का चूर्ण ६ माझे मिश्रित करके घृत और मिश्री के साथ मिलाकर सेवन करे और ऊपर दूध पिये तो उत्तम वीर्यवर्धक होता है । ५. विदारी कंद के चूर्ण ६ मागे से १ तोला को घी और चीनी से चाटकर ऊपर से दूध पीने से या गूलर की छाल का काढा या स्वरस पीने से वृद्ध मनुष्य भी कामसम्पन्न हो जाता है । अथवा विदारीकद के चूर्ण को विदारीकंद स्वरस में भावित करके उपर्युक्त अनुपान से ले । मात्रा १ तोला | ६ आमलको चूर्ण को आमलको स्वरस मे सात भावना देकर छाया में सुखाकर रख ले | इस चूर्ण को घृत और मधु मिलाकर सेवन करे और साथ में दूध पिये तो वृष्य क्रिया होती है । ७. केबाछ और तालमखाने के वीज का चूर्ण ६ माशे उसमे १ तोला मिश्री चूर्ण मिलाकर दूब के अनुपान से सेवन । ८ गुञ्जा को जड या वीज का चूर्ण ६ माशे अथवा गुंजामूल और शतावरी प्रत्येक का चूर्ण ४-४ माशे लेकर मिलाकर प्रतिदिन दूध के अनुपान से लेने मे उत्तम वाजीकर होता है । ९ उच्चटादियोग - गुजा, कॅवाद्य तथा गोक्षुर वोज का चूर्ण बनाकर तीनो को मिलाकर ६ मागे - १ तोला | दूध में पकाकर मिश्री डालकर पोने से वृद्धावस्था में काम का वर्द्धक होता है, तो युवावस्था में इसका पूछना हो क्या है ? १०. मधुयष्टि चूर्ण १ तोला, घृत १ तोला मधु १ तोला, मिश्रित करके दूध नाथ नित्य दिन एक बार लेने से नित्य सम्भोग के लिये पुरुष उत्सुक रहता है । ११ गोक्षुरादि चूर्ण - गोखरू, तालमखाने के वीज, शतावर, शुद्ध कॅवार के बीज, नागवला तथा अतिवला के मूल का चूर्ण बनाकर ६ मागे से १ तोले की मात्रा में दूध के अनुपान से लेने से अतिवृष्य होता है गोक्षुरकः क्षुरकः शतमूली वानरि नागबलातिबला च । चूर्णमिट पयसा निशि पेयं यस्य गृहे प्रमदाशतमस्ति || १२ गेहूँ और केंवाछ के वोज को दूध में पकावे अथवा केंवाछ और उडद की दाल को दूध में पकावं, ठंडा होने पर उसमें घी और मधु मिलाकर सेवन करे । १३ अश्वत्थ ( पीपल ) के फल, भूल, त्वक् और शुद्ध से सिद्ध किये क्षीर पाक विधि से पकाये, दूध में मिश्री और मधु मिलाकर सेवन करने से चटक पक्षी के समान व्यक्ति कामुक हो जाता है । अश्वत्थामलमूलत्वक्शुगासिद्धपयो नरः । पीत्वा सशर्कराक्षोत्रं कुलिङ्ग इव हृप्यति || (स० चि० २६)

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