Book Title: Agam 38 Chhed 05 Jitkalpa Sutra
Author(s): Jinbhadragani Kshamashraman, Punyavijay
Publisher: Babalchand Keshavlal Modi
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स्वोपज्ञभाष्ययुतं
[ गाथा
णाभिपायं गिण्हसि, असमत्ते चैव भाससि वयणे । सुकं बिललोणकर, तिण्णे अहवा वि दोच्चंगे || १९५५ ॥ एमेव य रुक्खे वी, भंजितु आणेह बेति अपरिणतो । णिफावादी रुक्खे, भणामि ण दुमे अहं हरिए । १९५६ ॥ एमेव य बीयाई, आणेती आणिए गुरू भणति । अंबिल विद्धत्थाणि व, भणामि ण वि रोहणि समत्थे ॥ १९५७ ॥ ॐ ॥ ६९ ॥
तह धितिसंघयणोभयसंपण्णा तदुभएण हीणा य । आयपरोभयणोभयतरगा तह अण्णतरगा य ॥७०॥
fafagore देहे बली, धितिबलिओ देहदुब्बलो कोइ । कोयी दोहि वि बलिओ, दोहिं पी दुब्बलो कोइ || १९५८ ॥ दोहि वि बलिए सव्वं, धितिहीणे जत्थ चिट्ठति धिती से । आसज्ज व देहबलं, देज्जा लहुयं उभयहीणे || १९५९ ॥ अहवा पंच विकप्पा
hat पुरिसा पंचह, आयतरादी इमे उ णायव्त्रा । पढमो आयतरो तू, णो परयो परतरे बितिओ ॥। १९६० ।। उभयतरो तू ततिओ, णोभयह चउत्थओ उ णायव्वो । अण्णयरो परयो तू, पंचमओ होइ गातव्वो ॥१९६१ ॥ आयतर - परतराणं, को णु विसेसो ? ति एत्थ चोदेति । आततरो चउत्थादी, जं दिज्जति तं तु णित्थरति ॥ १९६२ ॥ वेयावच्चकरो तू, गच्छस्स उवग्गहम्मि वट्टति तु । एसो तु होति परतरो, चतुभंगो एव णायव्वो ॥१९६३ ॥ वेयावच्चतराणं, एकं सक्केति दो ण णित्थरति । पंचमगो तू पुरिसो, अण्णतरो एस जातव्वो । १९६४ ॥ ० ॥ ७० ॥
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