Book Title: Tulsi Prajna 2002 10
Author(s): Shanta Jain, Jagatram Bhattacharya
Publisher: Jain Vishva Bharati

View full book text
Previous | Next

Page 79
________________ भाव मन की उत्पत्ति के लिए जो प्रयत्न होता है, वह मनोयोग है । वचन की उत्पत्ति के लिए जो प्रयत्न होता है, वह वचनयोग होता है। काय की क्रिया की उत्पत्ति के लिए जो प्रयत्न होता है, वह काय योग है। 24 कर्मबंध के भेद - योग और कषाय के निमित्त से आत्मा के साथ कर्म परमाणुओं का जो बंध होता है, वह चार प्रकार का होता है - प्रकृति बंध, स्थिति बंध, अनुभाग बंध और प्रदेश बंध | प्रकृति बंध - प्रकृति नाम स्वभाव का है। आने वाले कर्मपरमाणुओं के भीतर जो आत्मा के ज्ञान-दर्शनादिक गुणों के आवरण रूप स्वभाव पड़ता है, उसे प्रकृतिबंध कहते हैं । 25 स्थितिबंध - स्थिति नाम काल की मर्यादा का है । कर्म-परमाणुओं के आने के साथ ही उनकी स्थिति भी बंध जाती है कि ये अमुक समय तक आत्मा के साथ बंधे रहेंगे 26 अनुभाग बंध - कर्मों के फल देने की शक्ति को अनुभाग कहते हैं। कर्म परमाणुओं में आने के साथ ही तीव्र या मन्द फल देने की शक्ति भी पड़ जाती है, इसी को अनुभाग बंध कहते हैं। प्रदेश बंध - जीव प्रदेशों का और कर्मप्रदेशों का जो सम्बंध होता है, उसका नाम प्रदेश बंध है 128 इन चारों बंधों में से प्रकृति बंध और प्रदेश बंध का कारण योग है तथा स्थिति बंध और अनुभाग बंध का कारण कषाय है । प्रकृति बंध के भेद - चारों प्रकार के बंधों में प्रकृतिबंध के आठ भेद हैं- 1. ज्ञानावरण, 2. दर्शनावरण, 3. वेदनीय, 4. मोहनीय, 5. आयुष्य, 6. नाम, 7. गोत्र और 8. अन्तराय । 1. ज्ञानावरण- - ज्ञान के आवरक कर्म को ज्ञानावरण कहते हैं । 2. दर्शनावरण - दर्शनावरण की प्रकृति पदार्थ का अवलोकन न होने देना है अर्थात् जो पदार्थ के दर्शन में बाधक हो, उसे दर्शनावरण कहते हैं । दर्शन गुण के आवरक कर्म को दर्शनावरण कहा जाता है। जैसे— प्रतिहार (द्वारपाल) राजा के दर्शन की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को उसके दर्शन में बाधा पहुंचाता है, वैसे ही दर्शनावरण कर्म पदार्थ के दर्शन के बाधा पहुंचाता है - 3. वेदनीय – जो पुदगलस्कन्ध मिथ्यात्व आदि कारणों के वश कर्मपर्याय रूप से परिणत होकर जीव के लिए सुख-दुःख का कारण होता है, उसे वेदनीय कहा जाता है । 31 4. मोहनीय – जो प्राणियों को मोहित करता है, उन्हें सत्, असत् के विवेक से रहित करता है, उसका नाम मोहनीय है । 32 76 5. आयु - भव को प्राप्त कराने वाले कर्म को आयु कहते हैं । जो पुद्गल मिथ्यात्वादि कारणों से नरकादिभवधारण करने की शक्ति से परिणत होकर जीव में निविष्ट हैं, उनकी आयु संज्ञा है । Jain Education International For Private & Personal Use Only तुलसी प्रज्ञा अंक 118 www.jainelibrary.org

Loading...

Page Navigation
1 ... 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112 113 114 115 116 117 118 119 120 121 122 123 124 125 126 127 128 129 130 131 132 133 134 135 136 137 138