Book Title: Tulsi Prajna 1990 09
Author(s): Mangal Prakash Mehta
Publisher: Jain Vishva Bharati

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Page 33
________________ (८) मद्य के प्रभाव से यकृत वसीय अम्लों का संश्लेषण एवं संचय अधिक करने लगता है। इससे भूख कम होती है और गैस बनता है । मद्यपान से मूत्रलता बढ़ती और मूत्र-नियंत्रक हार्मोन का उत्पादन कम होता है। मद्य वासना का उत्तेजक है शरीर-तंत्र में मद्य का अधिकांश यकृत में चयापचित होकर उष्मा उत्पन्न करता है। लगभग ०.६ लीटर मद्य मारक हो सकता है। ३. उपचार मद्य के व्यसन को दूर करने में मनोवैज्ञानिक विधियों, योग, खानपानपरिवर्तन तथा डाइ-सल्फिराम-जैसी औषधियां सहायक होती हैं। ___ सारणी ४ से यह स्पष्ट है कि मद्य निर्माण के समय वनस्पति कोशिकायें बाहर से डाली जाती हैं। वे विकसित होती हैं और अपनी जनसंख्या में अल्प काल में ही अपार वृद्धि कर लेती हैं । मद्य के किंचित् अधिक सांद्रण होने पर ये कोशिकायें विकृत होकर अक्रिय हो जाती है, अधिकांश अवक्षेपित हो जाती हैं। इसलिये मद्य से और मद्य में जीवोत्पत्ति की बात वैज्ञानिक दृष्टि से तथ्यपूर्ण नहीं है। हां, यह अवश्य है कि आसव, अरिष्ट या अनेक मदिराओं का आसेवन नहीं किया जाता, अतः उनमें एकेन्द्रिय तथा अक्रियकृत वनस्पति कोशिकायें विलयन, कोलायड या निलंबन के रूप में बनी रहती हैं । लेकिन उत्तम कोटि की मदिराओं के आसवित होने से उनमें यह दोष नहीं पाया जाता । ऐसा प्रतीत होता है कि यह शास्त्रीय विवरण अनासवित मद्यों के आधार पर किया गया है क्योंकि सामान्य जन इनका ही उपयोग करते हैं। मद्योत्पादी वनस्पति की ये कोशिकायें त्रस हैं या स्थावर--इस पर पिछली सदी के वैज्ञानिकों में विवाद रहा है। इनके लिये स्थावर और त्रसों के बीच एक पृथक् जीव श्रेणी मानी गई थी। पर अब इन्हें वनस्पति की श्रेणी में ही लिया जाता है । फलतः स जीव घात का सिद्धांत मद्य की अभक्ष्यता का आधार नहीं मानना चाहिये। इसके अन्य प्रभाव ही इसकी अभक्ष्यता को पुष्ट करते हैं। शास्त्रों में मद्य की अभक्ष्यता के कारणों में उसके अनेक व्यक्तिगत व सामाजिक कुप्रभावों को निरूपित किया गया है । वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह माना जाता है कि मद्य की अल्पमात्रा (६-१० मिली०) औषध, ताजगी, ज्वर-शमन आदि अनेक कारणों से लाभदायी हो सकती है पर अधिक मात्रा हृदय, यकृत, वृक्क तथा मस्तिष्क के कुछ सक्रिय भागों को प्रभावित करती है। इस कारण ही सुखाभास, मोहकरता एवं खण्ड १६, अंक २ (सित, ..) २० For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org

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