Book Title: Tattvarthadhigam Sutra
Author(s): Labhsagar Gani
Publisher: Agamoddharak Granthmala

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Page 95
________________ श्री तत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् नारक सम्बंधी, तीर्यंच सम्बंधी, मनुष्य सम्बंधी और देवता सम्बंधी, इस तरह चार प्रकार के आयुष्य कर्म है । (१२) गतिजातिशरीराङ्गोपाङ्ग निर्माणबन्धन सङ्घातसंस्थानसंहननस्पर्शरसगन्धवर्णानुपूर्व्यगुरु लघूपघात परराघातातपोद्योप्रत्येकशरीर त्रससुभगसुस्वरशुभ तोच्छ्वास विहायोगतयः सूक्ष्मपर्याप्तस्थिरा देय यशांसि सेतराणि तीर्थकृत्त्वं च । १ गति, २ जाति, ३ शरीर, ४ अंगोपांग, ५ निर्माण, ६ बन्धन, ७ संघात, ८ संस्थान, ६ संहनन ( संघयण), १० स्पर्श, ११ रस, १२ गन्ध, १३ वर्ण, १४ आनुपूर्वी १५ अगुरुलघु, १६ उपघात, १७ पराघात, १८ आतप, १६ उद्योत, २० उच्छवास, २१ विहायोगति २२ प्रत्येक शरीर, २३ त्रस, २४ सौभाग्य, २५ सुस्वर, २६ शुभ, २७ सूक्ष्म, २८ पर्याप्त, २६ स्थिर, ३० आदेय, ३१ यश, प्रतिपक्षी के साथ यानी, ३२ साधारण, ३३ स्थावर, ३४ दुर्भग, ३५ दुःस्वर, ३६ अशुभ, ३७ बादर, ३८ अपर्याप्त, ३६ अस्थिर, ४० अनादेय, ४१ अयश, ४२ और तीर्थंकरत्व ये ४२ भेद नाम कर्म के जानने, श्रर उत्तर नाम तो अनेक प्रकार के हैं । (१३) उच्चैर्नीचैश्च । उच्च गोत्र और नीच गोत्र ये दो भेद गोत्र कर्म के हैं । (१४) दानादीनाम् । दानादि के विघ्न करता वह अन्तराय है १ - दानान्तराय, २ लाभान्तराय ३ भोगान्तराय ४ उपभोगान्तराय और ५ बीर्यान्तराय इस तरह उसके पांच भेद होते हैं । ८६ (१५) आदितस्तिसृणामन्तरायस्य च त्रिंशत्सागरोपमकोटीकोट्यः परा स्थितिः ।

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