Book Title: Shrungarmanjari
Author(s): Kanubhai V Sheth
Publisher: L D Indology Ahmedabad
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शृंगारमंजरो
पहिला गुणं कैसा लिखू, केहा पछइ सार, तुह्म गुण सघला सरिखां, मुज मन पडिउं विचार. २२४० सज्जन जेहनू सिर छेदिया पछी, पुणरवि ससिहर बिज्ज, तस आदेई 'ए'कार करि, ते मनि घणउ धरिन्ज २२४१ शिशिरह आदिम मास जे, धरि एक मंत्र जि देइ, तेह म उतारसि चित्तथी, दिनि दिनि अधिक करेइ. २२४२. सज्जन सनेहा आपणा, अधिक वधारइ चींति, मत वीसारसि वल्लहा, परदेसई प्रीति. २२४३ मनमा छइ घणी वातडी, के कागलि न लिखाइ, दोखी दुरियन जगि घणा, मिलिया पखई न कहाइ. २२४४ सज्जन काइ कहाव्यो, आहां अह्म सरखं कान, घणउं लिखु सिरं लेखमां, लिखतां थाइ राज. २२४५, रखे वीसारु चिंतडइ, धरयो मोह अपार, वहिला मिलवां आवयो, लेख लिखू लखवार. २२४६ हलदह नामई नाम जे तीहचर अरि तस छेहि, 'ख'मज्झ करे संठवी, मोकलयो धरी नेह. २२४७ वली संदेश कहावयो, वहिलु लिखयो लेख, जुहार अमारु मानयो, जां नाव मिलीइ मेख. २२४८ अधिकुं उछउं जे लिख, कुडू कागल माहि, ते अपराध अहमारडउ, रखे धरु मन मांहि. २२४९ भाद्रव वदि दशमी गुरौ, कागल नेह विशेखि, जयवंत पंडित वीनवइ, अ वाहालानु लेख. २२५०
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सात-दीप कागल करु , जउ मिमि मायर च्यारि, तुहइ गुण वाहाला तणा, लिखता नावइ पार. २२५१ लेख लिखीइ इम सुंदर, भेजइ प्रोउनइ पासि, दिन थोडइ मेलावडउ, हवइ हसइ टोल विलास :२२ अंक दिनि पुढी शशि मुखी, संजइ रयणी छेह, सुहुणामां प्रीउ देखीउ, तव उठी ससनेहि. २२५३ सही ए सुहुणइ ते करिउं, जे वइरो न कराइ, सुजन देखाडी रंगभरि, क्षणमां अपहरीय इ. २२५४ लाख जोयण सज्जन वसइ, मिलीयां सुपन मझारे, फट रे पापिणि आंखंडी जागी करिउ परिहार. २२५५
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