Book Title: Samadhitantram
Author(s): Devnandi Maharaj, Jugalkishor Mukhtar
Publisher: Bharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad

View full book text
Previous | Next

Page 85
________________ समाधिसंग उस उत्प्रेक्षाजालका नाश करनेके लिये उदमी मनुष्य किस कमसे उसका नाश करे, उसे बतलाते हैं अन्वयार्थ--( अवती ) हिंसादिक पंच अन्नतों-पापोंमें अनुरक्त हुआ मानव (खतं आदाय ) व्रतोंको ग्रहण करके, अद्रतावस्था में होनेवाले विकल्पोंका नाश करे, तथा ( व्रती ) अहिंसादिक प्रतोंका धारक ( ज्ञानपरायणः ) ज्ञानभावनामें लीन होकर, प्रतावस्थामें होने वाले विकल्पोंका नाश करे और फिर अरहत-अवस्थामें ( परात्मज्ञानसम्पन्नः ) केवलज्ञानसे युक्त होकर ( स्वयमेव ) स्वयं ही बिना किसीके उपदेशके (परः भोत ) परमात्मा होवे-सिद्धस्वभागको प्राप्त करे ! भावार्थ-विकल्पजालको जीतकर सिद्धि प्राप्त करनेका क्रम अवतीसे प्रती होना, प्रतीसे शानभावनामें लीन होना, शानभावनामें लीन होकर केवलज्ञानको प्राप्त करना और केवलज्ञानसे सम्पन्न होकर सिद्धपदको प्राप्त करना है ।।८।। यथा च वविकल्पो मुक्तिहेतुर्न भवति तथा लिङ्गविकल्पोऽमीत्याह-- लिङ्ग देहाश्रितं दृष्टं बेह एवात्मनो भवः ।। न मुच्यन्ते भवासस्माते ये लिसकताऽऽग्रहाः ॥७॥ टोका-लि जटाधारणनग्नत्वादिदेहाधित इष्ट शरीरधर्मतया प्रत्पिन्न । देह एवासानो भव: संसारः । यत एवं सस्माये लिगकृतामहा: लिंगमेव मुक्त हेतुरिति कृताभिनिवेशास्तेन मुच्यते । कस्मात् मचात् ।। ८७ ॥ जिस प्रकार व्रतोंका विकल्प मोक्ष का कारण नहीं उसी प्रकार लिंगका विकल्प भो मोक्षका कारण नहीं हो सकता, ऐसा प्रतिपादन करते हैं___ अन्वयार्थ-(लिङ) जदा धारण करना अथवा नग्न रहना आदि वेष ( देहाधितं दृष्ट ) शरीरके आश्रित देखा जाता है । देह एव ) और शीर हो ( आत्मनः) आत्माका ( भवः) संसार है ( तस्मात् ) इसलिये ( ये लिङ्गकृतापहाः ) जिनको लिङ्गका ही आग्रह है-चार वेष धारण करनेसे मुक्तिको प्राप्ति होती है ऐसी हछ है (ते ) वे पुरुष' ( भवात् ) संसारसे ( न मुच्यन्ते ) नहीं छूटते हैं। भावार्थ-जो जीव केवल लिंग अथवा बाह्य वेषको ही मोक्षका कारण मानते हैं वे देहात्मदृष्टि है और इसलिये मुक्तिको प्राप्त नहीं हो सकते। क्योंकि लिगका माभार देह है और दह ही इस बारमाला

Loading...

Page Navigation
1 ... 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105