Book Title: Ratnapala Nrup Charitra
Author(s): Surendra Muni
Publisher: Pukhraj Dhanraj Sheth

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Page 114
________________ * चतुर्थ परिच्छेद है [ Eve वहां उसका संस्कार करने के लिए सब महाजन इकट्ठे हुए तथा विवेकी धनदत्त भी वहां गया। निर्विवेकी धन के उन्माद से आपे से रहित सिद्धदत्त उन लोगों के बुलाने पर भी नहीं गया। उस शव को लेकर सब महाजन शमसान ___ में गये परन्तु "अज्ञात कुल-शील' उसको कोई अग्नि नहीं देता। तब सब महाजनों ने विचार करके धनदत्त से कहा"हे सौम्य ! तू इसका अग्नि-संस्कार कर / उन महाजनों को राजा की तरह अनुल्लंघ्य शासन मानकर बुद्धिमान् धनदत्त ने उनका कथन स्वीकार किया। धनदत्त अग्नि-संस्कार के ज्ञान से निश्चिन्त था। सब महाजन दूर जाकर बैठ गये / शव को चिता पर रखकर उसने उसका वस्त्र उघाड़ा तो उसकी कमर में एक गांठ के अन्दर 5 रत्न देखे / उसके सिवाय उन रत्नों को किसी दूसरे ने नहीं देखा था। तो भी उसने विचारा कि उत्तम मनुष्य को अदत्त कभी नहीं ग्रहण करना चाहिए। इस हृदय के विवेक से उस निस्पृही ने उन : रत्नों को नहीं लिया। उसने महाजनों को बुलाकर पांचों ही रत्न दिखा दिये। उसके निर्लोभ से विस्मित हुए सब महाजनों ने उसे कहा-"हमारे कहने से तू ही इन अमूल्य रत्नों को ले ले। इस प्रकार तुझे अदत्ता-दान-दोष नहीं लगेगा।" फिर उसने विचारा कि इस प्रकार के अनाथ धन का राजा स्वामी P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust

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