Book Title: Pind Niryukti
Author(s): Manekyashekharsuri, Kanchanvijay
Publisher: Devchand Lalbhai Pustakoddhar Fund

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Page 340
________________ धमा. रत्नीयावचूर्युपेता पिण्डनियुक्ति ॥१५०॥ संताविओ विगयसरणो । सोयंतो रोइंतो कंदतो जाव चिट्ठामि ॥ ८॥ ता मे सयलसमाहियकजविणासणपरेहिं अपिएहिं । आजमं परि०९ संजोगो जिण ! जा दुस्सहोज्जुत्ति ॥ ९ ॥ जा तेण दुहेण य दुरूिकओ वि कहमवि गमामि जिण ! कालं । ता कंस्कादुरूकेणं गहियो वीराचार्यसीहेण हरिणो । ॥ १० ॥ एवं परिभवपमुहेहिं दुरूकलक्खे जगडिओ नाह ! । जमवत्थमहं पत्तो त कहिउँ भरसि तं चेव ॥ ११॥ तटीकाता अतुलपालस्स दयालयस्स तुह सेवगोवि जमिमेहिं । दुरूकेहि कयस्थिज्झामि सामि हीही अजुत्तमिणं ! ॥ १२ ॥ हुं नायं [ जिणा II या अन्त्यसमं ] जिणंद तुह सेवगे महं जेण । खंतिपमुहंमि धम्मे तइ भणिए निरुच्छाहो ॥ १३ ॥ ता देहि खंतिखग्ग कोहभदं जेण तेण मा भागः। जिण ! हणिमो । अपहि य मद्दववजं माणगिरिं चूरिमो जेण ॥ १४ ॥ नियडिउरगीनिवारणि अज्झवविझाए कुण जिण ! पसायं । लोहरहदलणमुत्तीगया य दाणेण य पयासी ॥ १५ ॥ तह देहि तांव सत्ती जह तव अरदए नासिमो गई । अस्संजमदलणे सुसंजमंमि जिण ! कुण ममुस्साहं ॥ १६ ॥ सचं असचहणणं सोयं च असोयपिहहणणं होइ । परिगहहणणमकिंचणमबंभहणणं जिण | बंभ ॥ १७ ॥ इय एवंविह दसविहधम्मे सिग्धं अधम्मनासयरे । तुह पयकमलपसाया होउ ममं तिहुयणप्पणया ॥ १८ ॥ जेण पियविओगाइयदुहाइगलघलिऊ ण एयाई । अणुवममुहपरिकलिए सासयसोक्खंमि गच्छामि ॥ १९ ॥ इय भववहरिवीरगणीवायगसंजयमि वह वंदिया, परिहियकरणसमसायर ! सुरनररायपणमिया । इट्टविओगविए मुहदुइतविए णमई तुह नाह ! पविहिया, जिण विन्नित्तिए सजयबंधवदयरय हवउ सहलिया ॥ २० ॥ तओ कालेण सिद्धोत्ति गाथार्थः ॥ ६२९ ॥ इति वीरगणिविरचित्तायां पिंडनियुक्तिवृत्तावेषणाख्यं तृतीयं द्वारं समाप्तमिति.॥ उक्कमेषणाद्वारं, तदुक्तौ तूक्ता ग्रहणैषणेति, अथ संयोजनाद्वारं प्रस्तुतं, तत्रैव गृहीतस्याहारस्य विधिना प्रासः कार्य इति प्रासैषणायां १५०॥ Jain Education in For Private Personel Use Only Iww.jainelibrary.org

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