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पंचास्तिकाय प्राभृत
४०५ क्रमशः समरसीभाव समुत्पन्न होता जाता है इसलिये परम वीतरागभावको प्राप्त करके साक्षात् मोक्षका अनुभव करते हैं। _[अब केवलव्यवहारावलम्बी ( अज्ञानी ) ] जीवों का प्रवर्तन और उसका फल कहा जाता
परन्तु जो केवलव्यवहारावलम्बी हैं वे वास्तवमें भित्रसाध्यसाधनभावके अवलोकन द्वारा निरंतर अत्यन्त खेद पाते हुए, (१) पुन:-पुनः धर्मादिके श्रद्धानरूप अध्यवसानमें उनका चित्त लगता रहनेके कारण, [२] बहुत श्रुतके ( द्रव्यश्रुतके ) संस्कारोंसे उठनेवाले विचित्र [अनेक प्रकारके ] विकल्पोंके जाल द्वारा उनकी चैतन्यवृत्ति चित्रविचित्र होती है इसलिये और (३) समस्त यति-आचारळे समदायरूप तण्में प्रवर्तनरूप कर्मकाण्डकी धमारमें [आडम्बरमें ] वे अचलित रहते हैं इसलिये वे कभी किसीकी ( किसी विषयकी ) रुचि करते हैं, कभी किसीके ( किसी विषयके ) विकल्प करते हैं कभी कुछ आचरण करते हैं, दर्शनाचरणके लिये कदाचित् प्रशमित होते हैं, कदाचित् संवेगको प्राप्त हैं, कदाचित् अनुकम्पित होते हैं, कदाचित् आस्तिक्यको धारण करते हैं, शंका, कांक्षा, विचिकित्सा और मूढदृष्टिताके उत्थानको रोकनेके हेतु नित्य कटिबद्ध रहते हैं, उपबृंहण, स्थितिकरण, वात्सल्य और प्रभावनाको भाते हुए बारम्बार उत्साहको बढ़ाते हैं, ज्ञानाचरणके लिये स्वाध्यायकालका अवलोकन करते हैं, बहुत प्रकारसे विनयका विस्तार करते हैं, दुर्धर उपधान करते हैं, भलीभाँति बहुमानको प्रसरित करते हैं, निह्रवदोषको अत्यंत निवारते हैं, अर्थ, व्यंजन और तदुभयकी शुद्धिमें अत्यंत सावधान रहते हैं, चारित्राचरणके लिये-हिंसा, असत्य, स्तेय, अब्रह्म और परिग्रहकी सर्वविरतिरूप पंचमहाव्रतोंमें तल्लीन वृत्तिवाले रहते हैं, सम्यक् योगनिग्रह जिनका लक्षण है ऐसी गुप्तियोंमें अत्यंत उद्योग रखते हैं, ईर्या, भाषा, एषणा, आदाननिक्षेप और उत्सर्गरूप समितियोंमें प्रयत्नको अत्यन्त युक्त करते हैं, तप आचरणके लिये-अनशन, अवमौदर्य, वृत्तिपरिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्तशय्यासन और कायक्लेशोंमें सतत उत्साहित रहते हैं, प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्त्य, व्युत्सर्ग, स्वाध्याय और ध्यानरूप द्वारा निज अन्त:करणको अंकुशित रखते हैं, वीर्याचरणके लिये-कर्मकाण्डमें सर्व शक्ति व्याप्त रहते हैं, ऐसा करते हुए कर्मचेतनाप्रधानपनेके कारण-यद्यपि अशुभकर्मप्रवृत्तिका उन्होंने अत्यंत निवारण किया है तथापि शुभकर्मप्रवृत्तिको जिन्होंने भलेप्रकार ग्रहण किया है ऐसे वे, सकल क्रियाकाण्डके आडम्बरसे पार उतरी हुई दर्शनज्ञानचारित्रकी ऐक्यपरिणतिरूप ज्ञानचेतनाको किंचित् भी उत्पन्न न करते हुए, बहुत पुण्यके भारसे ( अंदर ) मन्द हुई चित्तवृत्तिवाले वर्तते हुए, देवलोकादिके क्लेशकी प्राप्तिकी परम्परा द्वारा अत्यन्त दीर्घकाल तक संसारसागरमें भ्रमण करते हैं। कहा भी है कि-चरणकरणप्पहाणा समयपर-मत्थमुक्कवावारा | चरणकरणस्स सारं णिच्छयसुद्धण जाणंति ।। अर्थ-जो चरण करण प्रधान हैं और स्वसमयरूप परमार्थमें व्यापाररहित हैं, वे चरण करण का सार जो निश्चयशुद्ध ( आत्मा ) उसका अनुभव नहीं करते ।