Book Title: Nirgrantha-1
Author(s): M A Dhaky, Jitendra B Shah
Publisher: Shardaben Chimanbhai Educational Research Centre
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जितेन्द्र बी. शाह
Nirgrantha
४२. अर्हत्प्रणीत नैगमादि प्रत्येक शत संख्य प्रभेदात्मक सप्तनयशतार नयचक्राध्ययनानुसारिषु ।
नयचक्र-वृत्ति, पृ० ८८६. एक्केक्को य सत विधो. (आव० नि०७५९)..... ति तस्य शतभेदस्य सप्त नय शतार नयचक्रे।
नयचक्र-वृत्ति, माइल्ल धवल, सं० पं० कैलाशचन्द्र शास्त्री, भारतीय ज्ञानपीठ, काशी १९७१, पृ० ७८९. ४३. जावइया वयणवहा तावइया चेव होंति णयवाया। जावइया णयवाया तावइया चेव पर समया ॥
सन्मतिप्रकरण- ३.४७. ४४. जावन्तो वयणपहा तावन्तो वा नया विसद्दाओ। ते चेव य परसमया सम्मत्तं समुदिया सव्वे ॥
विशेषावश्यकभाष्य, स्वोपज्ञवृत्ति सहित, सं० दलसुख मालवणिया, लालभाई दलपतभाई भारतीय संस्कृति विद्यामन्दिर, अहमदाबाद-९,
प्रथम संस्करण, १९६८, द्वितीय भाग-२७३६, पृ० ५२७. ४५. तयोर्भङ्गा:- १ विधिः, २ विधि-विधिः, ३ विधेविधि-नियमम्, ४ विधेर्नियमः, ५ विधि-नियमम्, ६ विधि-नियमस्य विधिः, ७ विधिनियमस्य
विधिनियमम्, ८ विधिनियमस्य नियमः, ९ नियमः, १०, नियमस्य विधिः, ११ नियमस्य विधिनियमम्, १२ नियमस्य नियमः॥ द्वादशार-नयचक्र,
पृ० १०. ४६. तत्र विधिभङ्गाश्चत्वार आद्या उभयभङ्गा मध्यमाश्चत्वारो नियमभङ्गाश्चत्वारः पाश्चात्या यथासंख्यं नित्यप्रतिज्ञाः, नित्यानित्यप्रतिज्ञाः
अनित्यप्रतिज्ञाश्च। द्वादशार-नयचक्र-वृत्ति, पृ०८७७.
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