Book Title: Nandisutram Author(s): Devvachak, Malaygiri Publisher: Devchand Lalbhai Pustakoddhar Fund View full book textPage 5
________________ नन्दिसूत्रम्। ॥१॥ प्रस्तावना। -: प्रस्तावना : विभाग-१ [१] नंदी (ज्ञान) माहात्म्य जैनशासनमा ज्ञानने कर्मनाशर्नु उत्तम सोधन कहथुछे मुक्तिनी साधनामां ज्ञाननी परम आवश्यकता स्वीकारवामां आवी छे, ज्ञान वगरनी क्रिया पूरेपूर फळ आपवामां असमर्थ छे. ज्ञान ए आत्मगुण छे, ज्यारे क्रिया माटे तेम नथी. जो के क्रिया कर्मनाश करनार छ-पण ए क्रिया केवी रीते करवी तेनो बोध ज्ञान द्वारा थाय छे अने एवं ज्ञान वीतराग भगवंतो के जेओ सर्वज्ञ सर्वदर्शी छ-तेओना उपदेशरूप आगम-शास्त्रोथी थाय छे. तेवां आगमसूत्रो जैनशासनमा हालमा ४५नी संख्यामा छे. तेमज तेना आधारे रचायेला अनेक भहान सूत्रो पण छे. तेमा एकला ज्ञानर्नु निरूपक आगमशास्त्र 'नंदी' छे. आ नंदीसूत्र परम मंगल छे. केमके आत्माने स्वच्छ करनार, स्वस्वरूपमा लावी आपनार अने अनादिना मोह अंधकारने हरनार छे. तत्वार्थसूत्रकारे 'सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्राणि मोक्षमार्गः' आ सूत्रमा ज्ञानने वचमा मूक्यु' छे. जे 'देहलीदीपक 'न्याये बन्ने बाजु प्रकाश आपे छे. रत्नत्रयीमां तेणे हृदयनुं स्थान लीधुं छे. एटले सम्यक्त्व अने १ ज्ञानस्य फल विरतिः प्रशमरतिप्रकरण । ॥१॥ Jain Education International For Private Personel Use Only www.jainelibrary.orgPage Navigation
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