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क्रमबद्धपर्याय की श्रद्धा में पुरुषार्थ
क्रमबद्धपर्याय की श्रद्धा में पुरुषार्थ आत्मा के अनन्तगुण भी स्वसन्मुख होकर परिणमने लग जाते हैं; फलतः अनन्तगुणों का मिश्र स्वाद-वेदन भी आंशिक धारावाहिक वर्तने लगता है उसमें ज्ञान का परिणमन भी होता है। ज्ञान का स्वभाव स्व-पर प्रकाशक होने से उसको पर के साथ स्व का ज्ञान भी वर्तने लगता है। इस कारण ज्ञानी को एक साथ दोनों का ज्ञान वर्तने से, वह स्व को स्व के रूप में और पर को सहजरूप से पर जानता हुआ उत्पन्न होता है; इसलिये उसको भेदज्ञान भी सहजरूप से वर्तता रहता है; वह संवर अधिकार में बताया गया ज्ञानी का भेदज्ञान है। जिसकी महिमा इसी अधिकार के कलश १३०-१३१ में बताई है। और ऐसे भेदज्ञान में ही कलश १८१ में कही गई प्रज्ञारूपी छैनी कार्यरूप होकर परिणमती है। ___ उक्त भेदज्ञान अकेले ज्ञानगुण के परिणमन में नहीं होता; अपितु उसमें अनन्त गुणों की शुद्धता का पृष्ठबल रहता है। जैसे स्वस्वामित्वसम्बन्ध शक्ति के कारण ज्ञान के प्रत्येक परिणमन का स्वामी आत्मा ही है, ज्ञेय नहीं, और अकार्य-कारण शक्ति के कारण ज्ञान, ज्ञेय का कारण भी नहीं और न ज्ञेय का कार्य है तथा त्याग-उपादान शून्यत्व शक्ति के कारण ज्ञान न तो ज्ञेय से कुछ लेता है और न ज्ञेय को कुछ देता है अर्थात् त्याग अथवा ग्रहण से शून्य रहते हुए वर्तता है। इसी प्रकार प्रकाशशक्ति के कारण ज्ञान आत्मा में ही स्वयं प्रकाशमान विषद् स्वसंवेदन (स्वानुभव) रूप कार्य करता है अर्थात् ज्ञान का प्रकाश (जानने रूपी कार्य) आत्मा का स्वयं आत्मा में ही होता है। तात्पर्य यह है आत्मा का स्व-पर प्रकाशक ज्ञान स्वयं ही स्वयं से स्वयं में ही प्रकाशमान होता है, आत्मा से बाहर नहीं होता, ज्ञेय में जाकर नहीं होता । ज्ञान स्व-पर का ज्ञायक होते हुए भी उसको स्व-पर
प्रकाशक कहा गया है, कारण ज्ञान तो ज्ञेय से निरपेक्ष रहकर, तटस्थ रूप से अपने परिणमन का प्रकाशन मात्र कर देता है। इसीप्रकार स्वच्छत्वशक्ति के कारण दर्पण के समान तटस्थ रहते हुए ज्ञेय जैसे हों वैसे ही ज्ञान दर्पण में प्रतिभासित होने लगते हैं, ज्ञान उनमें कुछ भी छेड़छाड़ नहीं करता। इसी प्रकार अन्य गुणों का भी समझ लेना; क्योंकि आत्मा के अनन्त गुणों के कार्यों का प्रकाशन आत्मा में तो ज्ञान द्वारा ही होता है। इसप्रकार भेदज्ञान करने वाली ज्ञान की पर्याय, अनन्तगुणों के पृष्ठबल सहित भेदज्ञान करती है; इसलिये ऐसा भेद ज्ञान ज्ञानी आत्मा को सहज होता है। अज्ञानी के ज्ञान को अन्य गुणों का पृष्ठबल नहीं होने से, मात्र भेदज्ञान के विकल्प तो हो जाते हैं; किन्तु भेदज्ञान नहीं हो पाता । इतना अवश्य है कि सम्यक्त्व सन्मुख अज्ञानी को भी जितनीजितनी मिथ्यात्व एवं अनन्तानुबंधी की क्षीणता होती जाती है उतनी-उतनी ही उसकी भी परिणति में सत्यार्थ भेदज्ञान की पात्रता बढ़ती जाती है और स्वानुभव होते ही ज्ञानी को होने वाला सहजवर्तने वाला भेदज्ञान वर्तने लगता है।
प्रश्न - भेदज्ञान के समय भी ज्ञेयों के भेद भी तो ज्ञान में अनेक रहते हैं, उस भेदज्ञान में निर्विकल्पता कैसे हो सकेगी?
उत्तर - ऐसा नहीं है। भेदज्ञान के विषय तो दो ही रहते हैं, अनेक नहीं, स्व के रूप में तो ज्ञायक के आकार परिणत ज्ञानपर्याय रहती है एवं पर के रूप में ज्ञेयों के आकार परिणत ज्ञानपर्याय रहती है। इस प्रकार ज्ञान के समक्ष तो मात्र स्व एवं पर का ज्ञान रहता है, अनेकता नहीं रहती।
प्रश्न - परज्ञेयों के भेद तो अनेक हैं, वे निरस्त कैसे होंगे?