Book Title: Jinabhashita 2003 11 Author(s): Ratanchand Jain Publisher: Sarvoday Jain Vidyapith Agra View full book textPage 3
________________ आपके पत्र, धन्यवाद : सुझाव शिरोधार्य 'जिनभाषित' (अक्टूबर २००३) अंक को पढ़ा। आश्चर्य । सम्पादकीय, जरा सोचिये, जिज्ञासा समाधान आदि महत्वपूर्ण सामग्री है कि प्रभावपूर्ण संम्पादकीय लेख नहीं था, जिसको पढ़के ही | निःसन्देह उपयोगी है। लेखन विनम्रतापूर्वक शिष्ट भाषा में ही पत्रिका की शुरूआत होती है। 'श्रावक का प्रथम कर्तव्य देव | होना चाहिए। समालोचना/समीक्षा का अधिकार मर्यादा के साथ पूजा' आलेख से डॉ. श्रेयांसकुमार जैन ने प्रभावपूर्ण प्रस्तुति की | ही कार्यकारी हो सकता है। अन्तरंग के साथ-साथ 'जिनभाषित' है, जिससे श्रावकों की जिनेन्द्र देव पूजा में दृढ़ श्रृद्धान बनने में | का बाह्य स्वरूप भी मनमोहक है। इसके लिए आप तथा सर्वोदय सहयोग मिलेगा। डॉ. पारसमल अग्रवाल ने सामायिक के द्वारा | जैन विद्यापीठ दोनों बधाई योग्य हैं। होने वाले अच्छे प्रभाव को आधुनिक विज्ञान के द्वारा सिद्ध करके आपका नम्र ऋषभचन्द्र जैन बहुत अच्छा प्रयास किया है। प्रायः श्रावक-श्राविकायें सामायिक आपके द्वारा प्रकाशित एवं सम्पादित पत्रिका जैन जगत में को मात्र साधुओं की क्रिया समझते हैं। जबकि सामायिक हम अपने विचारणीय विषयों रोचक एवं ज्ञानवर्धक सामग्री से परिपूर्ण सभी लोगों के लिये पूजा, स्वाध्याय आदि की तरह ही अति एक विशेष स्थान रखती है। इसकी अच्छी विशेषताओं में इसका आवश्यक है। अंक के प्रायः सभी लेख एवं बोध कथायें बहुत कागज, आकार एवं छपाई काफी आकर्षक है। प्रेरणास्पद हैं। दिनों दिन निरन्तर प्रगति करें। इन्हीं शुभकामनाओं मेरा निवेदन है कि आप 'पत्रिका' को न सिर्फ 'जैन सहित। समाज' बल्कि अन्य के लिए भी पठनीय बनाएँ। जिससे जैनधर्म श्रीमती रूचि जैन | को समझने में लोगों को आसानी हो जैन धर्मकी वैज्ञानिकता से नई दिल्ली | लोगों का परिचय हो। "जिनभाषित' अंक ८ सितम्बर २००३ मिला। अङ्क की पत्रिका में कुछ रोचक प्रसंग, कथाओं, विचारों, कविताओं स्वच्छ सामग्री देखकर आनन्द विभोर हो उठा। सच आज ऐसी ही को भी स्थान दिया जाये। पृष्ठ संख्या एवं सामग्री बढ़ाई जाए पर पत्रिका की आवश्यकता है। यथा नाम तथा लेख होना ही पत्रिका कागज, आकार एवं छपाई की गुणवत्ता को कम न किया जाए। की महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए जो 'जिनभाषित' में है। रोहित कुमार जैन आपका सब्जी मंडी, अवागढ़ (एटा) बसन्त कुमार जैन 'शास्त्री' वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पूछा जाए जैन पत्रिकाओं में कौन श्रेष्ठ बसन्त निवास, शिवाड़ आचार्य श्री का प्रवचन 'कर्मों की गति' और 'सदलगा है? कहना तो बहुत मुश्किल है। लेकिन 'जिनभाषित' अपने में ही एक अलग गरिमा रखती है। संपादकीय से लेकर, लेख, शंका की भूमिपर आ.श्री विद्यासागर जी की शिष्याओं का चातुर्मास' समाधान, उत्तम विचार, अनेक नई-नई बातें समाज और विद्वान लेख और उसके कुछ फोटोग्राफ बहुत अच्छे लगे। ऐसा तो किताब के समक्ष आती हैं। पत्रिका में खोट निकालना वैसे ही है जैसे का हर पन्ना पढ़ने लायक होता है। ज्ञान से भरा हुआ रहता है। पं. कहते हैं कि 'जिन वच में शंका न धार'। फिर भी कुछ बिन्दु नीचे बैनाड़ा का 'शंका समाधान' भी बहुत अच्छा लगा। .| प्रस्तुत करने का साहस कर रहा हूँहमें अंक का इंतजार रहता है क्योंकि उसमें आचार्यश्री १. ज्योतिष और वास्तु के विषय में भी हर एक अंक में का प्रवचन, कोई तीर्थ क्षेत्र मंदिर का फोटो देखकर हमें घर बैठे कुछ चर्चा अवश्य रखें। ही तीर्थ वंदना हो जाती है। यात्रा हो जाती है। २. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भौतिक एवं अभौतिक स्तर पर प्रेमलता सुरेन्द्र कासलीवाल उनका सफल कैरियर कैसे बने। प्लॉट नं. ११७, सकलेचा नगर, ३. कुछ प्रतियोगिताएँ भी पत्रिका में शामिल करें। भोकरदन रोड, जालना गोष्ठी में 'जिनभाषित' का अगस्त ०३ का अंक मिला, आशीष जैन शास्त्री आभारी हूँ। एक या दो अंक प्रारम्भ में भी मिले थे। इस अंक में | शाहगढ़ नवम्बर 2003 जिनभाषित 1 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.orgPage Navigation
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22 23 24 25 26 27 28 29 30 31 32 ... 36