Book Title: Jignasa Journal Of History Of Ideas And Culture Part 02
Author(s): Vibha Upadhyaya and Others
Publisher: University of Rajasthan

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Page 174
________________ 390 / Jijriasa रानीसर ने पदमसर, कागो सूरजकुण्ड। इता निवाणा उपरां, जोधाणां री मंड।। महाराजा बख्तसिंहजी 1751-1752 ने अपने एकवर्षीय शासनकाल में पदमसर तालाब के पट्टे पर सात सीढ़ियां बनाकर श्रीमाली ब्राह्मणों को उनके तर्पण, पूजन के लिये उनको दान दिया। इस तालाब को जल सरोबार देखकर महाराजा ने कहा बख्ता कर सके तो कर, सरवर भर्यो नीर। हंसो फिर नहीं आ वसी. इहे सरवर री तीर।। जोधपुर के नीले कुएं के और तापी बावड़ी के संदर्भ में आज भी जोधपुरवासियों द्वारा यह कहा जाता है कि तापी बावड़ी अर नीमलो कुंओ। नहीं देख्यो वो जीवतो ही मुंओ।। सरकार की योजनाएं और उसका क्रियान्वयन जोधपुर के अन्य तालाबों को पाटने का प्रयास चल रहा है जहां अण्डर ग्राउण्ड मार्केट व बगीचे बनाने के हवाई महल बनाये जा रहे हैं। उन भराव वाले स्थानों पर यदि मार्केट या बस्ती को बसाया गया तो उनका भी परिणाम वही होगा। आज की सोच क्षणिक परिणाम प्राप्त करने की है। न तो लम्बी सोच है, न ऊंचे इरादे हैं। केवल वोटों की राजनीति के फायदे नुकसान के आधार पर तुरन्त निर्णय लिये जाते हैं। आज नल का पानी सुलभ है परन्तु मान लीजिये दुर्भाग्यवश किसी युद्ध के कारण बिजली दो दिन अनुपलब्झ रही तो यहां के लोग सुबह उठकर मुंह धोने का पानी कहां से लायेंगे? यही जलस्रोत उस समय से हमें याद आयेंगे और काम भी आयेंगे, जिनकी हमने दुर्दशा की है। इससे बढ़कर और क्या शर्म की बात होगी कि इन नहरों में सीवरेज व पाखाने की लाइनें लाकर छोड़ दी है। इन तालाबों, जलाशयों के निर्माताओं ने क्या सोचकर इनका निर्माण करवाया था और हम आधुनिकता के नाम पर इन जीवन के रक्षक जलस्रोतों को खुद ही नष्ट करते जा रहे हैं और कूड़े-कचरे का ढेर बना रहे हैं। अहमदाबाद में जिस वर्ष भूकम्प आया था और भयंकर तबाही हुई थी, उसके पीछे जब वैज्ञानिकों ने उसके कारण ढूंढे तो उनमें से एक महत्त्वपूर्ण कारण था वहां के प्राकृतिक जल स्रोतों को मिट्टी से भर देना। इस प्रकार भूमि में असंतुलन पैदा होता है और भूकम्प आने की संभावनाएं बढ़ जाती है। इन दिनों आपने पिचियाक के पास स्थित जसवन्तसागर बांध की दुर्दशा और बाढ़ के समाचार सुने होंगे। पिछले वर्ष, वर्षा में यह बांध टूट कर क्षतिग्रस्त हो गया था और आस-पास के कई गांव व बस्तियां बाढ़ की चपेट में आ गई थीं। प्रशासन ने वर्षा के बाद उसे मरम्मत कराने की स्वीकृति दी जिसके लिये करोड़ों का बजट प्रस्तावित था। एक वर्ष बीत गया परन्तु उस बांध की मरम्मत शायद इसलिये नहीं की गई कि इस बार अकाल पड़ेगा और उस रूपये का उपयोग अकाल राहत में किया जायेगा। सौभाग्य से इस बार भी बारिश पिछले वर्ष से ज्यादा हुई और वह जसवन्तसागर विखण्डित जर्जर हालत में अपने अस्तित्व को कायम रखने के लिए जूझ रहा है, और लोग बाढ़ की चपेट में आकर मर रहे हैं। बाढ़ नियन्त्रण कक्ष खोलकर उसमें टेबल कुर्सी लगा दी जाती है क्या यही जिम्मेदारी प्रशासन की बनती है। गरीब लोग भेड़बकरियों की तरह ऐसी लापरवाही के कारण मरने को मजबूर हो रहे हैं। मैं क्षमा चाहता हूं, परन्तु सच कहने से भी अपने आपको रोक नहीं पर रहा हूं। ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर आवाज उठाने की आवश्यकता है और जागे हुओं को जगाना होगा और उनकी जिम्मेदारियों के ढोल उनके गले में जब तक जनता नहीं डालेगी इन लोगों के जाग्रत अवस्था में लिये जा रहे खर्राटे बंद नहीं होंगे।

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