Book Title: Jain Dharm Vishayak Prashnottar
Author(s): Jain Atmanand Sabha
Publisher: Jain Atmanand Sabha

View full book text
Previous | Next

Page 245
________________ २१० गुरु स्वरूप ने ॥६॥ सातमा गुरु पोपट तोते समान है. 9 तोता इहां बहुविध शास्त्र सूक्त कथादि परिज्ञान प्रागल्भ्यवान् ग्रहण करनां. तोता रूप करके रमणीय है १ क्रिया आंब कदली दामि फ लादि शुचि आहार करता है. इस वास्ते ही है. २ उपदेश वचन मधुरादि तोतेका प्रसिद्ध है ३ तैसें कितनेक गुरु वेष १ उपदेश २ सम्यक क्रिया. ३ तीनों करके संयुक्त है, श्रीजंबु श्रीवज्रस्वाम्या दिवत् इति सातमा गुरु स्वरूप भेद ||७|| आठमा गुरु काक समान है. जैसे काक में रूप सुंदर नही है १, उपदेशजी नहो, करुया शब्द बोलनेसें २ क्रियानो अही नही है, रोगी, बूढे बलदादिकोंके प्रांख कढ लेनी, चूंच रगमनी और जानवरोंका रुधिर मांस, म लादि प्रशुचि आदारि दोनेसें ३ ऐसँही कितनेक गुरुयोंमे रूप१ उपदेश २ क्रिया ३ तीनोदी नही है, अशुद्ध प्ररूपक संयम रहित पास आदि जा नने, सर्व परतीर्थीकनी इसी जंगमे जानने ॥ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

Loading...

Page Navigation
1 ... 243 244 245 246 247 248 249 250 251 252 253 254 255 256 257 258 259 260 261 262 263 264 265 266 267 268 269 270